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भूतनाथ जी की महिमा

 
भूतनाथ जी की महिमाInformation related to भूतनाथ जी की महिमा.

सम्राट् अकबर के समय की घटना है । उस समय से पहले मुर्शिदाबाद और मालदा का प्रान्त गौड़ देश के अन्तर्गत था और गौड़ देश के हिन्दू राजाओं के शासन में था । यह प्रसिद्ध ही है कि अकबर गुण-ग्राही सम्राट् था और हिन्दू-मुसलमान दोनों का, गुणों के अनुसार, समान रुप नसे आदर किया करता था । १६वीं सदी के उत्तर-भाग में भागलपुर (बिहार) के दत्तवाटी नामक स्थान में श्री थाकोदत्त नामक एक बंगाली सज्जन रहा करते थे, जो अकबर की ओर से वहाँ के ‘कानूनगो’ नियुक्त हुए थे और उनको बड़ी जागीर मिली थी । भागलपुर, चौकी चम्पानगर आदि परगने उन्हीं की जागीर में थे । उस समय जिस प्रकार ‘चीफ़ जज’ को ‘सदर अमीन’ कहा करते थे, उसी प्रकार ‘कानूनगो’ का एक बड़ा पद माना जाता था । वह राजा का पर्यायवाची शब्द था । वह बादशाह का कानूनी सलाहकार तो रहा ही करता था, किन्तु अपनी जागीर में अपने कानून चलाने का भी उसे अधिकार होता था । ‘रुलिंग प्रिन्स’ का ही वह प्रकारान्तर कहा जा सकता था । यह अधिकार उसे बादशाह की ओर से सनद और पञ्जे के द्वारा मिला करता था ।
थाकोदत्त ऐसे ही एक जागीरदार थे । उनकी कन्या शक्तिपुर (मुर्शिदाबाद – बंगाल) के एक जमींदार श्रीराम घोष से ब्याही थी । श्री थाकोदत्त के देहान्त के पश्चात् उनका पद और जागीर श्रीराम घोष को मिली । उनकी कार्य-परायणता और राज-सेवा से प्रसन्न होकर अकबर ने उन्हें वंश परम्परा ‘महाशय’ अर्थात् राजा की उपाधि और पञ्जे के साथ सनद प्रदान की, जो उनके खानदान में अब तक सुरक्षित है । अकबर की आज्ञा का यह पञ्जा एक सुवर्ण के पत्र पर अंकित हैं । श्रीराम के देहान्त के उपरान्त उनका पद उनके प्रपौत्र प्राणनाथ को मिला, जिन्होंने अपना राज-भवन भागलपुर में गंगाजी के तट पर बनवाया । प्राणनाथ के प्रपौत्र लोकनाथ हुए । उन्हीं के समय की यह घटना है ।
श्री लोकनाथ घोष ने भागलपुर के पास के एक टीले पर एक मनोरम को ी बनवाई थी और उसी में परिवार-सहित रहकर वे अपनी जागीर की देखभाल किया करते थे । उनका सीधा सम्बन्ध बादशाह से होने के कारण बंगाल के नवाबों के उत्थान-पतन के झमेले में उनका कोई हाथ नहीं था और यही कारण है कि बंगाल-बिहार और उड़ीसा पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी का अधिकार स्थापित हो जाने पर कम्पनी ने उनकी स्वतन्त्रता में कोई हस्तक्षेप नहीं किया और शासक उनका अच्छा आदर सम्मान किया करते थे ।
कम्पनी के शासन काल में नील की खेती करने वाले अंग्रेजों का बड़ा बोल-बाला था । एक नीलवाले ने भी उसी टीले पर एक को ी बनवा ली थी, जिससे लोकनाथ को विषाद होने लगा । एक दिन उनके घर की कोई बहू या बेटी स्नान कर घर लौट रही थी । उसे देखकर एक निलहे साहब के मुँह से निकल गया कि ‘क्या बंगालियों में भी इतना सौन्दर्य हो सकता है !’ जब यह बात लोकनाथ ने सुनी, तब इस स्थान में अपने को सुरक्षित न समझ कर को ी त्याग कर अन्य स्थान में जा बसने का निश्चय कर लिया ।
निलहों की को ी के मुखिया से बातचीत हुई और यह तय पाया गया कि महाशय जी यह को ी निलहों को दे दें और इसके बदले में भागलपुर के गंगा-तट की सौ बीघा जमीन वे ले लें, जो निलहों के अधिकार में है और जहाँ ‘भगवती बेहुला’ का पवित्र स्थान है । यही चौकी चम्पानगर कहाता है । सम्भव है कि नाथ-सम्प्रदाय के नव-नाथ-चरित्र के अनुसार यही वह स्थान हो, जहाँ मत्स्येन्द्रनाथ के शिष्य गौड़-नरेश राजा गोपीचन्द (साध्वी मैनावती के कुमार) की राजधानी थी । इतिहास में इसका नाम ‘चम्पावती नगरी’ पाया जाता है । जो हो, वहीं लोकनाथ घोष ने अपनी को ी गंगा-तट पर बनवा ली और यहीं स-परिवार सुख के साथ वे रहने लगे ।
लोकनाथ अपनी जमींदारी में एक बड़ा तालाब खुदवा रहे थे । एक दिन अकस्मात् उन्हें स्वप्न में ‘भैरवनाथ’ के दर्शन हुए, जो कह रहे थे कि ‘तुम तालाब खुदवा रहे हो, उसी भूमि में मैं दीर्घ-काल से पड़ा हुआ हूँ । वहाँ से मुझे अपने घर में ले आओ । तुम्हारा कल्याण होगा ।’
लोकनाथ आस्तिक तो थे ही, साथ ही अच्छे साधक और परम भगवद्भक्त भी थे । उन्होंने बड़ी सावधानी से तालाब की मिट्टी हटवाना आरम्भ किया और स्वप्न के दृष्टान्तानुसार ‘बटुक-भैरव’ की भव्य मूर्ति भू-गर्भ से प्रकट हो गई । यह मूर्ति काले पाषाण की ३ फुट ऊँची हैं और ‘बटुक-भैरव’ के शास्त्रोक्त ध्यान के अनुसार निर्मित हुई है ।
मूर्ति-भञ्जक मुसलमानों के अत्याचार जिस समय में चरम सीमा तक पहुँच गये थे, उस समय भक्त लोग अपने इष्ट-देव की मूर्ति को किसी सुरक्षित स्थान में ले जाते या सुभीता न होने पर किसी जलाशय में विसर्जन कर देते अथवा भू-गर्भ में छिपा देते थे । सम्भव है कि यह मूर्ति भी किसी साधक के द्वारा छिपा रखी गई हो और वह भूमि उपयुक्त भक्त के अधिकार में आ जाने पर उसके परिवार के कल्याण के लिए इस प्रकार प्रकट हो गई हो ।
‘भैरव’-मूर्ति के प्रकट हो जाने पर उसे उ ा कर घर ले जाने का प्रयत्न किया जाने लगा । बैलगाड़ी पर चढ़ाकर उसे ले जाने का निश्चय हुआ, परन्तु कारीगर उसे उ ाने के लिए जब उद्यत हुए, तब क्या देखते हैं कि मूर्ति की कमर में १०-१२ हाथ लम्बा एक मोटा साँप लिपटा है और पास आने-वालों को फण उ ाकर फूत्कार करता हुआ भय दिखा रहा है । अतः मूर्ति के पास जाने का किसी का साहस नहीं होता था । तब लोकनाथ जी ने हृदय से प्रार्थना की कि ‘प्रभो ! मैं आपकी आज्ञा का ही तो पालन कर रहा हूँ, फिर ऐसा भय क्यों दिखा रहे हैं ?’
प्रभु ने प्रार्थना सुन ली और साँप वहाँ से कहीं खिसक गया । खिसक क्या गया, वहीं जा पहुँचा, जहाँ मूर्ति स्थापित होने जा रही थी । उस घटना को हुए, सैंकड़ों वर्ष बीत गए हैं, परन्तु वह सर्प कभी-कभी दिखाई देता है और अपने चमत्कार भी दिखा देता है । उसे प्रतिदिन धान का लावा और दूध चढ़ाया जाता है और उसे वह ग्रहण भी करता है । उसके एक ही चमत्कार का यहाँ उल्लेख करना पर्याप्त होगा ।
श्री लोकनाथ जी की जमींदारी से जो गल्ला (अन्न) आता, उसे छानने-बीनने के लिए बहुत-सी मजदूरिनें नियुक्त थी । अपने स्वभावानुसार वे अन्न चुराकर भी ले जाया करती थीं । एक दिन एक मजदूरिन ने अन्न चुराकर अपने आँचल में छिपा रखा था । नाग-राज ने बड़ी युक्ति से चोरी पकड़ ली । वे धीरे से कहीं आ गए और उसके शरीर में लिपट गए । बेचारी मजदूरिन बड़ी घबराई और चिल्ला कर इधर-उधर छटपटाने लगी । इस झाड़-झपट में उसका पल्ला खुल गया और आँचल में छिपाया हुआ अन्न चारों तरफ बिखर गया । नाग-राज ने छोड़ दिया और वे जैसे आए थे, वैसे ही कहीं चल दिए ।
अब बटुकनाथजी का चमत्कार देखिए । मूर्ति गाड़ी पर चढ़ा दी गई और गाड़ीवान के स्थान में एक ब्राह्मण को गाड़ी हाँकने के लिए बै ा दिया गया । यह बात ‘बटुक जी’ को अच्छी नहीं लगी । गाड़ी वहीं रुक गई । बहुत प्रयत्न करने पर भी वह आगे न बढ़ सकी । तब लोकनाथजी के मन में प्रेरणा हुई की भगवान् मेरे हाथ से गाड़ी हँकाना चाहते हैं । उन्होंने गाड़ी पर चढ़कर बाग सँभाली, तो गाड़ी फूल की तरह हल्की होकर दौड़ने लगी । इस प्रकार गाड़ी जहाँ-जहाँ रुकी, वहाँ-वहाँ उन्होंने ‘शिव-मन्दिर’ बनवा दिए हैं । बटुकनाथकी सकुशल घर पहुँच गए तथा बड़े ा तथा भक्ति-भाव से उनकी सेवा-पूजा होने लगी । लोकनाथजी ने उनकी सेवा-पूजा के लिए बहुत-सी देवोत्तर भूमि छोड़ दी थी, जिससे सेवा-पूजा का कार्य चलता आ रहा है ।
लोकनाथ जी पश्चात् उनके भ्रातुष्पुत्र उत्तराधिकारी हुए । उनके पुत्र परेशनाथ, परेशनाथ के पौत्र उमानाथ और उनकी सातवीँ पीढ़ी में सुप्रसिद्ध विद्वान् दान-वीर तारकनाथ हुए । वंश-परम्परया इनके घर में ‘श्री बटुक जी’ उनकी सुरक्षा करते हैं । उनको रोट, आटे के लड्डू, मछली, भात, बरा, चने की घुँघनी आदि का भोग लगता है और नियमित पर्व-दिन में ‘छाग-बलि’ भी दी जाती है । शाक्त-सम्प्रदायानुसार ही उनकी आराधना होती है ।
स्वर्गीय बाबू तारकनाथ जी के समय में भी ‘बटुकनाथजी’ के अनेक चमत्कार देखे गए, जिनमें से दो-एक का यहाँ उल्लेख कर दिया जाता है । तारकनाथजी के जामाता बाबू रामचन्द्र सिंह विश्वास, जो मुर्शिदाबाद के रहने वाले थे और इन्स्पेक्टर ऑफ स्कूल के पद पर थे, सन् १९१८ में ऐसे बीमार हुए कि उनके जीने की कोई आशा नहीं रही । उनकी पत्नी अर्थात् तारकनाथजी की कन्या ने ‘बटुक जी’ के चरणों में सात दिन तक धरना दिया, तब ‘बटुक जी’ की मूर्ति से पसीना चूने लगा । यहाँ तक कि मूर्ति में मोम से जो चाँदी की आँखें जमाई जाती थी, वे भी पसीने के कारण नहीं जमती थीं और चन्दन भी बह जाता था । ‘बटुक जी’ ने धरना देने वाली कन्या को एक जड़ी अमुक स्थान से निकाल कर खिलाने की स्वप्न में आज्ञा दी । जड़ी तो मिल गई, परन्तु डॉक्टरों की अतिरिक्त सावधानी से वह खिलाई नहीं जा सकी और बाबू रामचन्द्र की मृत्यु हो गई ।
इसी प्रकार बाबू तारकनाथजी का एक मुकदमा विलायत में प्रीवी-कौंसिल में चल रहा था । एक दिन क्या देखते है कि ‘बटुक जी‘ के मन्दिर का द्वार बन्द हैं, किसी प्रकार नहीं खुलता है ! तब रात में तारक जी को स्वप्न हुआ कि “मैं विलायत में मुकदमे की पैरवी कर रहा हूँ । लौटूँगा, तब द्वार खोल दूँगा ।” हुआ भी ऐसा ही । तीसरे दिन आप ही द्वार खुल गया और तारक जी मुकदमा जीत गए ।
तीसरी घटना और भी विलक्षण है । एल तेली के यहाँ से ‘बटुक जी’ को चढ़ाने के लिए एक पाव तेल प्रतिदिन आता था । तेली ने एक दिन तेल नहीं दिया और पुजारी को डाँट बताई कि ‘पाव भर तेल भैरव जी को थोड़े लगता है । कुछ उनको चढ़ाते और बचा-खुचा घर ले जाकर अपने काम में लाते हो । ऐसा न करते, तो भैरव जी को आज तेल की कमी न पड़ती ।’
बेचारा पुजारी कुछ उत्तर नहीं दे सका, परन्तु ‘बटुक जी’ को यह बात अखर गई । उन्होंने रात्रि के समय तेली के सरसों के खेत में जाकर सारा खेत उजाड़ डाला । सवेरे वह क्या देखता है कि सारा खेत चौपट हो गया है, मानों किसी ने खड़ाऊँ पहन कर उसे कुचल डाला हो । खेत में खड़ाऊँ के चिह्न स्पष्ट दीख पड़ते थे । पूजा के समय देखा गया कि मूर्ति के सामने को खड़ाऊँ रखी रहती थी। उनमें सरसों की पत्ती और बालें चिपटी हुई हैं ।
भगवान भैरवनाथ ने इस चमत्कार से चेता दिया कि वे भक्तों पर कृपा करने में जैसे फूल से भी कोमल और कृपालु हैं, वैसे दुष्टों को दण्ड देने में वज्र से भी क ोर और महान् उग्र हैं । यह भक्त की सच्ची भक्ति की महिमा है ।

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