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Gangaur 2019 Dates~Gauri puja~गणगौर

Gangaur 2019 Dates~Gauri puja~गणगौर
This year's Gangaur 2019 Dates~Gauri puja~गणगौर

Monday, 08 Apr - 2019

Gangaur~गणगौर in year 2019 will be celebrated on Monday, 8th April, 2019

गणगौर पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के आपसी रिश्तों व भगवान गणेश के जन्म से जु़ड़ी हुई पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है। जब माता पार्वती ने शिवजी से पुत्र की कामना की तो उन्होंने माता को 12 साल तक तपस्या करने को कहा। इस तपस्या के बाद उनको पुत्र प्राप्ति हुई। जिनका नाम गणेश रखा गया।

गणगौर पर्व भगवान् गणेशजी के जन्म की कथा से भी सम्बंधित है। इसी कथा से गणगौर पर्व की शुरुआत होती है। गणगौर पर्व के अंतर्गत ग्यारस को गणगौर माताजी के मूठ धराते हैं। इस दौरान पंडित के यहाँ जाकर टोकरियों में गेहूँ के जवारे बोये जाते हैं। परिवार में खुशी या शुभ होने पर गणगौर माताजी को अमावस्या के दिन बाड़ी से लाते हैं। तीन दिन तक घर में रखकर रात्रि जागरण और भजन-कीर्तन किया जाता है।

गणगौर पर्व गीत : गणगौर पर्व पर नखराली गणगौर अमो नाच दिखला दे जाणे, नाचे वन में मोर म्हारा छैल भंवर चितचोर, जयपुरिया देखला दो, माने एक वारी हो। नामक  गीत गया जाता है जिसका अर्थ शर्मीली गणगौर हमे ऐसा नाच दिखा जैसे जंगल में मोर झूमकर नाचता है। मेरे पति जिन्होंने मेरा दिल चुरा लिया है, वे एक बार मुझे ले जाकर जयपुर दिखा दे। उक्त गीत गणगौर पर्व के दौरान महिलाओं द्वारा गाया जाता है। सौभाग्यवती महिलाओं द्वारा अपने पति के लिए मनाए जाने वाले इस पर्व को नई पीढ़ी की महिलाओं ने भी इसके उसी रूप में अपना लिया है।


गणगौर पर्व मह्त्व : गणगौर पर्व को लेकर महिलाओं में अपार उत्साह रहता है। श्रृंगार के प्रतीक इस त्योहार में महिलाएं सामूहिक गीत गाती है, पूजा-अर्चना करती है और नृत्य करते हुए खुशियां मनाती हैं। साथ ही शिव-पार्वती से उन्ही की तरह अपने दांपत्य जीवन को खुशहाल बनाने की कामना करती हैं। बड़े बुजुर्ग बताते है कि यह परपंरा राजाओं-महाराजाओ के जमाने से चली आ रही है। पहले हर घर में ज्वारे बोए जाते थे। किंतु अब सिर्फ मंदिर में ही बोए जाते हैं। वर्तमान में नए गीत नहीं लिखे जा रहे हैं। राजस्थान से आए गीत अभी भी चल रहे हैं।

गणगौर उत्सव पूजन विधि : भक्त मानते है कि मूलतः यह पर्व राजस्थान और निमाड़ का है, जो सभी स्थानों पर मनाया जाता है। यह पर्व सुहागनें अपने सुहाग के लिए और कुंवारी लड़कियां शिवजी जैसे वर की कामना को लेकर यह पर्व मनाती है। घरो में बरसों से गणगौर की परंपरा को देखकर नई पीढ़ी की बहू-बेटियां भी इस पर्व को अपनाने में पीछे नहीं है। सुहागने कलश लेकर मंदिर जाती है। 12 पत्तियों को पूजा के स्थान पर रखती है। इस दिन पान खाया जाता है, गुलाल लगाया जाता है और गन्ने का रस भी पीया जाता है।

महिलाएं पूजन सामग्री एकत्रित कर आस्थापूर्वक पूजन करती है। महिलाएं इसका उद्यापन भी करती हैं। मंदिरो में समाज की सभी महिलाएं एकत्रित होकर शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना करती है और फूलपाती निकालती हैं। इस दौरान गणगौर माता की शोभायात्रा भी निकाली जाती है। पति की लंबी उम्र एवं घर में सुख-शांति के लिए महिलाएं गणगौर पर्व मनाती है। शीतला सप्तमी से गणगौर पर्व आरंभ हो जाता है। नवरात्रि की तीज पर पूजा-अर्चना होती है। सदियों से चली आ रही परंपराओं में कोई अधिक बदलाव नहीं आया है। नई पीढ़ी ने उन्हें जस का तस अपना लिया है।
 
 
 
 
 
 
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