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Festival - Vasant Panchami 2018 Date ~ वसंत पंचमी

Vasant Panchami ~ वसंत पंचमी in 2018 will be observed on monday 22 th january, 2018.Timings for worship is from 8.57 A.M. to 11.06 A.M. in the morning. Hinduism is a way of life rather than a religion. The people practicing Hinduism have firm faith on Gods and Goddesses whom they worshiped on various occasions by performing Puja and rituals. Vasant Panchami is a festival that worships Goddess Saraswati as well as it signifies the beginning of Vasant Ritu (spring season). Magh Sud 5 (5th day of the bright fortnight of the lunar month of Magh – falls usually in the month of January or February) is the day of Vasant Panchami and is also celebrated as Shree Panchami or Saraswati Puja in West Bengal and few other parts of Orissa. On this day Goddess Saraswati is worshipped in various names and fames - the Goddess of Learning, the deity of Gayatri, the fountain of fine arts and science, and the symbol of supreme vedantic knowledge. The image of Goddess Saraswati depicts her sitting on a vehicle that symbolizes her supreme power. The white swan of Saraswati symbolizes Satwa Guna (purity and discrimination), the lotus of Lakshmi the Rajas Guna and the tiger of Durga the Tamas Guna. Saraswati is shown possessing four hands and plays \\\\"Veena\\\\", an Indian string musical instrument. Vasant Panchami or Saraswati Puja is celebrated with great enthusiasm and Hindu temples and households are full of activity on this day. This is also a special day for school children as they observe it with great reverence.

 

इस वर्ष यह 22 जनवरी सोमवार को मनाया जाएगा। बसंत पंचमी मां सरस्वती का जन्मोत्सव दिवस होने के कारण वसंत पंचमी के दिन बालकों का विद्यारम्भ संस्कार करना अति उत्तम है। सरस्वती पूजा का मुहूर्त समय सुबह 8 बजकर 57 मिनट से दोपहर 11 बजकर 06 मिनट तक सर्वोत्तम है इसके बाद दोपहर 11 बजकर 06 मिनट से दोपहर 1 बजकर 15 मिनट तक मध्यम मुहूर्त है।

हिंदुत्व एक धर्म से अधिक एक जीवन पद्धति है । हिंदुत्व को मानने वाले लोग विभिन्न पर्वो पर अपने देवी देवताओ का पूजन मनन करते जिनमे वो अटूट श्रद्धा और आस्था रखते है। वसंत पंचमी एक ऐसा ही पर्व है जिसमे देवी माँ सरस्वती कि पूजा कि जाती है और साथ ही यह वसंत ऋतु के आगमन का भी सूचक है। बसन्त पंचमी का पर्व माघ शुक्ल पंचमी को मनाया जाता है। इस दिन ज्ञान की देवी माँ सरस्वती का पूजन किया जाता है। पश्चिम बंगाल और उड़ीसा के कुछ अन्य भागो में यह पर्व सरस्वती पूजा और श्री पूजा के रूप में मनाया जाता है। इस दिन देवी सरस्वती कि पूजा विभिन्न नामो से कि जाती है जैसे कि ज्ञान कि देवी, देवी गायत्री, कला और विज्ञानं की देवी और सर्वोच्च वैदिक ज्ञान की देवी। भारत के पूर्वी हिस्सों, पश्चिमी बांग्लादेश, नेपाल और कई राष्ट्रों में बड़े हर्ष के साथ मनायी जाती है। स्त्रियाँ वसंत पंचमी को पीले वस्त्र धारण करती हैं।

भारतीय पुरातन संस्कृति और नेपाल में एक वर्ष को छः मौसमों में विभाजित किया जाता है वसंत उनमे सबसे अधिक हर्षोल्लास का मौसम मन जाता है। वसंत में पुष्प अति सूंदर प्रतीत होते है। सरसों से लहलहाते खेत सोना की तरह चमकने लगते है, जौ और गेहूँ के पौधों पर बालियाँ निकलने लगतीं, आम के पेड़ बौरो से लद जाते है और चारो और रंग-बिरंगी तितलियाँ और मधु मक्खिया मँडराने लगतीं। वसंत ऋतु का स्वागत करने हेतु माघ महीने की पंचमी तिथि को बडा उत्सव  मनाया जाता है जिसमें भगवान् विष्णु और कामदेव का पूजन होता है, यह पर्व वसंत पंचमी उत्सव कहलाता है । बसंत पंचमी को शास्त्रों में ऋषि पंचमी से भी उल्लेखित किया गया है, एवं शास्त्र-पुराणों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी विभिन्न प्रकार से वसंतोत्सव का विवरण मिलता है।

भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने श्रष्टि के आरम्भ में जीवों-जन्तुओ, मुख्य रूप से मनुष्य योनि की रचना की। किन्तु अपने सर्जन से वे असंतुष्ट थे। उन्हें कुछ कमी प्रतीत हुई जिसके कारण हर ओर मौन सा दिखाई देता है। भगवान् विष्णु की अनुमति से  ब्रह्मा जी ने अपने कमण्डल से जल छिड़का और भूमि पर जलकण बिखरने से उसमें स्पंदन हुआ। जिसके पश्च्यात वृक्षों के मध्य से एक अद्भुत शक्ति का उत्सर्जन हुआ। इस उत्सर्जन एक चतुर्भुजी अतिसुंदर स्त्री का प्राकट्य हुआ जो एक हाथ में वीणा लिए थी तथा उनका दूसरा हाथ वर मुद्रा में था एवं दोनों हाथों में माला तथा पुस्तक थी। माँ सरस्वती की प्रतिमा में उनको अपने वाहन श्वेत हंस पर बैठा दर्शाया गया है जो कि उनकी सर्वोच्च शक्ति का परिचायक है। श्वेत हंस सत्व गुण (पवित्रता और भेदभाव रहित होने ) का प्रतीक है, कमल माँ लक्ष्मी के रज गुण का प्रतीक है शेर माँ दुर्गा के तमो गुण का प्रतीक है। माँ सरस्वती के चार हाथ है और वे वीणा बजती हुई दर्शायी जाती है । ब्रह्मा जी के अनुरोध पर जब देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, तो श्रष्टि के समस्त जीव-जन्तुओं तथा प्राणियों को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा कोलाहल करने लगी, हवा चलने से सरसराहट होने लगी। तब ब्रह्मा जी ने उन देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा। सरस्वती माँ का पूजन शारदा, वीणावादनी, बागीश्वरी, भगवती, और वाग्देवी सहित अनेक नामों से किया जाता है। माँ सरस्वती विद्या और बुद्धि प्रदायिनी हैं। स्वर, संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी कहलाती हैं। बसन्त पंचमी के दिन को माँ सरस्वती जन्मोत्सव के रूप में भी मनाया जाता हैं। 

ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है-"प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।" अर्थात ये परम चेतना हैं। माँ सरस्वती के रूप में ये हमारे ज्ञान बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हमारे सदाचारों और मेधा का आधार माँ भगवती सरस्वती ही हैं। माँ सरस्वती की समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है।शास्त्रों और पुराणों के अनुसार भगवान् श्री श्रीष्ण ने माँ सरस्वती से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी पर्व को आपकी भी पूजा आराधना की जाएगी और इस प्रकार भारत में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी माँ सरस्वती की भी पूजा होने लगी जो कि आज तक जारी है। वसंत पंचमी और सरस्वती पूजा हिन्दू मंदिरो में बहुत उत्साह और हर्षोल्लास से मनाई जाती है और घरो में भी विभिन्न प्रकार के कार्य किये जाते है। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चो के लिए भी यह एक प्रमुख दिवस होता है क्योंकि यह दिवस उनकी माँ सरस्वती में अटूट श्रद्धा से जुड़ा होता है। पतंगबाज़ी का वसंत से कोई सीधा संबंध नहीं है। लेकिन पतंग उड़ाने का रिवाज़ हज़ारों साल पहले चीन में शुरू हुआ और फिर कोरिया और जापान के रास्ते होता हुआ भारत पहुँचा।

प्रकृति का कण-कण वसंत ऋतु के आगमन पर प्रफुल्लित होकर खिल उठता है। वसंत ऋतु न केवल मनुष्य अपितु पशु-पक्षी और प्रकृति तक हर्ष और उल्लास से विभोर हो जाते हैं। प्रतिदिन नयी उमंग से सूर्योदय होता है और नव चेतना प्रदान करता हैं। वैसे तो यह पूर्ण माघ मास ही उत्साह प्रदान करने वाला है, किन्तु वसंत पंचमी (माघ शुक्ल पंचमी) का पर्व भारतीय लोगो के जीवन को विभिन्न प्रकार से प्रभावित करता है। आदिकाल से ही वसंत पंचमी ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता हैं। संसार के महान ज्ञानी और शिक्षाविद जो भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं, वे वसंत पंचमी को मां सरस्वती का पूजन करके उनसे ज्ञान एवं बुद्धि का वरदान मांगते है। जिस प्रकार सैनिकों के लिए शस्त्रों और विजयादशमी का महत्व है तथा  व्यापारियों के लिए अपने तराजू, बाट, बहीखातों और दीपावली का महत्व है, उसी प्रकार कलाकारों और विद्वानों के लिए पुस्तकों और वसंत पंचमी का है। कवि, लेखक, गायक, वादक, नाटककार हों या नृत्यकार, सब वसंत पंचमी के दिन का प्रारम्भ अपने उपकरणों की पूजा और मां सरस्वती की वंदना और पूजा के साथ करते हैं।

वसंत पंचमी का पर्व अनेक प्राचीन प्रेरक घटनाकर्मो से भी जुड़ा है। त्रेता युग में रावण द्वारा सीता के हरण के पश्च्यात प्रभु श्रीराम उनको खोजने दक्षिण की ओर अनेक स्थानों पर गए दंडकारण्य भी उनमे से एक था। यहीं पर श्री राम भक्त माता शबरी रहती थी जो कि भील जाति से सम्बंध रखती थी। जब राम उनकी कुटिया में आये, तो उन्होंने चख-चखकर मीठे बेर श्रीराम जी को खिलाये। प्रेम में पगे झूठे बेरों वाले इस भक्ति भाव को रामकथा के सभी गायकों ने भिन्न प्रकार से प्रस्तुत किया।  इन दिनों दंडकारण्य का वह क्षेत्र गुजरात और मध्य प्रदेश में फैला हुआ है। भारत के गुजरात राज्य के डांग जिले में वह स्थान है जहां शबरी मां का आश्रम था। प्रभु श्री रामचंद्र जी वसंत पंचमी के दिन ही वहां आये थे। आज भी उस क्षेत्र के वनवासी एक शिला को पूजते हैं, जिसके बारे में उनकी श्रध्दा है कि श्रीराम आकर उसी पर बैठे थे। शबरी माता का मंदिर भी वही है।

पूजन विधि:
वसंत पंचमी के दिन भगवान विष्णु का भी पूजन किया जाता है। प्रातः काल तैलाभ्यंग स्नान करके पीत वस्त्र धारण कर, विष्णु भगवान का विधिपूर्वक पूजन करना चाहिए तदुपरान्त पितृतर्पण तथा ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए। इस दिन सभी विष्णु मंदिरों में भगवान का पीत वस्त्रों तथा पीत.पुष्पों से श्रंगार किया जाता है।

पहले भगवान् गणेश भगवान सूर्य भगवान् विष्णु भगवान् शिव आदि देवताओं का पूजन करके  माँ सरस्वती देवी का पूजन करना चाहिए। माँ  सरस्वती पूजन करने के लिए एक दिन पूर्व संयम नियम से रहना चाहिए तथा दूसरे दिन स्नानोपरान्त कलश स्थापित कर, पूजनादि कृत्य करना चाहिए।

 
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