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Pilgrimage in India -विशेष धार्मिक स्थल


यह मंदिर जबलपुर (मध्य प्रदेश) के धनवन्तरीनगर मुहल्ले में एक वृहत् प्राकृतिक सरोवर के किनारे निर्मित है। मंदिर तो अपेक्षाकृत नवीन है, किंतु इसकी मूर्ति सैकडों वर्ष की है और इसका तिथि-निर्धारण कठिन है। इस प्रतिमा के रंग-रूप से ही इसकी प्राचीनतास्पष्ट होती है। हनुमान-विग्रह के कारण मंदिर में अपार ऊर्जा है और यह श्रद्धालुओं की मनोकामनापूर्तिमें सक्षम है।

जबलपुर का यह इलाका कभी झाडी-झंखाड से पटा था। इस ओर कोई शायद ही जाता था। कुछ वर्ष पूर्व खेलते-खेलते कुछ लडकों को विग्रह का पता चला। यह विग्रह छींदवृक्ष के नीचे पत्थर के टुकडे पर स्थापित था। कभी इसकी पूजा-अर्चना होती होगी, ऐसा इसको देखने से प्रतीत हुआ, किन्तु न जाने कितने वर्ष से यह उपेक्षित और अपूजित पडा था। आसपास के स्थान को साफ कर लोगों ने विग्रह का पूजन-अर्चन आरम्भ किया। विग्रह चमत्कारी निकला। कुछ दिनों के पश्चात् ही वह अपने स्थान से लुप्त हो गया। भक्त चिन्तित हुए। जी-जान से मूर्ति की खोज आरम्भ हो गई। कई दिनों के अथक परिश्रम के पश्चात् भी जब मूर्ति नहीं मिली तो उसे निकटवर्ती सरोवर में ढूंढने का अभियान चला और अन्तत:किनारे से सौ फुट की दूरी पर मूर्ति प्राप्त हो गई।

मूर्ति के जल के अन्दर चले जाने पर लोगों में मतवैभिन्यथा। कुछ का कहना था, किसी नास्तिक ने जानबूझ कर मूर्ति को पानी के हवाले कर दिया। अधिकांश का यह मानना था कि मूर्ति स्वयं पानी के अन्दर विलुप्त हो गई थी, क्योंकि हनुमान को यह पसंद नहीं था कि मात्र पत्थर के एक अनगढ और खंडित टुकडे पर उनकी पूजा-अर्चना की जाए। यह बात बहुतों के गले नहीं उतर रही थी कि कोई यह हिम्मत करेगा कि मूर्ति को उठाकर जल में फेंक दे। हनुमान के रुष्ट होने वाली बात ही लोगों को तर्क-संगत लगी। फिर क्या था, सरोवर के पास एक सुन्दर-सा चबूतरा निर्मित हुआ और मूर्ति इसी आकर्षक चबूतरे पर स्थापित हुई और उसका पूजा-अर्चन पुन:आरम्भ हो गई। श्रद्धालु यहां मनौतियां मानने लगे और पूरी भी होने लगीं। लोगों को समझते विलम्ब नहीं हुआ कि यह मूर्ति की प्राचीनताके फलस्वरूप है। पूर्वकाल में शायद ऋषि-मुनियों ने इसकी सेवा-पूजा की है, अत:यह मूर्ति सिद्ध एवं ऊर्जा-पूरित हो गई है। यह भी स्पष्ट हुआ कि भग्न पाषाण-खण्ड के बदले सुन्दर चबूतरे पर पूजित होने पर पवनपुत्र अत्यधिक प्रसन्न हो गए हैं और भक्तों की मनोकामनाएंपूर्ण कर रहे हैं।

1997में एक सुन्दर और छोटी कुटी का निर्माण चबूतरे के चारों ओर कर मूर्ति की आतप, वर्षा और शीत से रक्षा सुनिश्चित हुई, साथ ही यह प्रण किया गया कि तत्काल एक विशाल मंदिर के निर्माण का काम लगा शुरू किया जाए। श्रद्धालुओं ने यथाशक्ति चन्दा देना आरंभ किया और मंदिर का निर्माण होने लगा। आठ वर्ष लगे इस भव्य मंदिर के निर्माण में जो अपनी विशालता एवं स्थापत्य के कारण जबलपुर की पहचान ही बन गया।

इस मंदिर के विग्रह की विशेषता यह भी है कि यह उत्तरमुखीहै,सामान्यत: प्रतिमाएं दक्षिणमुखीहोती है। सिन्दुर-पुतेहनुमान-विग्रह का रंग तो लाल होता ही है, पर शायद हनुमान के स्वप्नादेशके आधार पर ही इस मंदिर का नाम लाला बाबा मंदिर रखा गया। प्राचीन विग्रह दादा के अलावा और क्या उपयुक्त संज्ञा पा सकता है। अत:यह मंदिर दादा-दरबार के नाम से विख्यात है।

आपदा-विपदा से मुक्ति देने और मनोकामनाओंकी पूर्ति करने वाले इस मंदिर के श्रद्धालु उत्तर भारत में ही नहीं, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और उडीसा आदि तक फैले हैं, जो कभी लाल बाबा से उपकृत होने के कारण उनके ऋणी हो गए हैं और नियमित रूप से मंदिर के लिए भेंट भेजा करते हैं। दर्शनों के लिए भी आते हैं।

चांदनी रात में सरोवर-तीर बसे इस मंदिर की छटा दर्शनीय होती है। सांध्य आरती के समय जब हनुमान की प्रार्थना-

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहम्।

दनुजवनकृशानुंज्ञानिनामग्रगण्यम्॥

सकलगुणनिधानंवानराणामधीशम्।

रघुपतिप्रियभक्तंवातजातंनमामि॥

-के स्वर मंदिर-प्रांगण को निनादित करते हैं तो भक्तों के मन-प्राण झूम-झूम उठते हैं।

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