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Pilgrimage in India -अदभुत धार्मिक स्थल


दिनेशपुर [उधमसिंह नगर]। देवभूमि में पुरातात्विक व धार्मिक महत्व के क्षेत्रों की भरमार है। तराई में रामबाग इनमें से एक है। यह चंद वंशियों की देवी भक्ति, बेक्साइड की बसासत व ब्रितानी एस्टेट का गवाह भी रहा है। वहां लगभग 323 वर्ष पहले मिले शिवलिंग में तमाम बदलाव देखे, पर प्राचीन शिवमंदिर के प्रति आस्थावानों की श्रद्धा बढती ही गई।

पुरातत्व विभाग की टीम ने रामबाग मंदिर के निकट 1988 में खुदाई की तो तमाम छोटी-बडी मूर्तियां मिलीं। पुरातत्वविदें के अनुसार पत्थरों को तराश कर तैयार की गई ये कला कृतियां 13वीं सदी से पूर्व की हैं। तब कुमाऊं-गढवाल में मूर्ति व स्थापत्य कला उत्कर्ष पर थी। देवी-देवताओं व देवगणों की ये मूर्तियां स्पष्ट करती हैं कि यह क्षेत्र धार्मिक लिहाज से खासा उर्वर रहा होगा। इस बात को 323 साल पूर्व घुमंतु बुक्साओं को मिला शिवलिंग भी बल देता है। आस्था के पुजारी बुक्साओं ने 1953 में इस पवित्र स्थान पर मंदिर स्थापित किया।

किंवदंती है कि मंदिर के पुजारी चंदू सिंह लखचौरसिया के दादा कल्याण सिंह की संतान नहीं थी। यह उस दौर की बात है जब तराई बियावान थी। बुक्सा कल्याण सिंह शिवभक्त थे। उन्हें स्वप्न में बाबा भोलेनाथ ने दर्शन दिए। कहा कि गांव में ही टीले पर शिवलिंग निकलेगा। यदि वह शिवलिंग के दर्शन करें तो मनोकामना पूरी होगी। दंतकथा के अनुसार कल्याण सिंह को शिव के आशीर्वाद से दो पुत्र भागमल व केदार सिंह प्राप्त हुए। भागमल ने मंदिर की स्थापना कर 20 वर्ष तक सेवा की। वर्ष 1993 से इस परंपरा को उनके पुत्र चंदू सिंह लखचौरसिया व उनकी पत्‍‌नी मंतो देवी निभा रही हैं। उन्होंने शिवमंदिर सुधार समिति और 2005 में आदिवासी शिव समिति गठित की। विश्वास है कि प्राचीन शिवमंदिर के दर्शन से सभी की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। मेले से पूर्व कांवडिए हरिद्वार से पवित्र गंगाजल लाकर शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं। फिर शंखनाद के साथ मेला शुरू होता है, जो पांच दिन चलता है। इसमें बाहरी क्षेत्रों से भी हर वर्ग के श्रद्धालु शामिल होते हैं।

दिन में तीन बार बदलता है रंग शिवलिंग

प्राचीन शिवमंदिर का शिवलिंग चमत्कारिक माना जाता है। सुबह, दोपहर व शाम इसका रंग बदलना आज भी लोगों को अचंभित करता है। साल दर साल शिवलिंग के आकार में वृद्धि होना भी चर्चाओं में है। किंवदंती है कि एक साधु ने शिवलिंग की थाह जानने को काफी गहराई तक खुदाई की, लेकिन वह पार नहीं जा सका और हारकर चला गया।

 

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