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Papmochni Ekadashi~पापमोचनी एकादशी


हिंदू कैलेंडर के मुताबिक़, पापमोचनी एकादशी कृष्ण पक्ष के दौरान चैत्र महीने की एकादशी (ग्यारहवें दिन) पर पड़ती है। यह सभी 24 एकादशियों में से अंतिम एकादशी मानी जाती है जो दो मुख्य त्योहारों, होलिका दहन और चैत्र नवरात्रि के बीच पड़ती है।


पापमोचनी एकादशी का महत्व:

पापमोचनी एकादशी के महत्व का वर्णन 'भाव्योत्तर पुराण' और 'हरिवसारा' जैसे ग्रंथो में किया गया है। इसका महत्व पहले राजा मन्धाता को ऋषि लोमसा द्वारा और फिर भगवान कृष्ण द्वारा पांडवों को उनमे भी सबसे बड़े राजा युधिष्ठिर को इसका महत्व बताया गया था। यह माना जाता है कि पापमोचनी एकादशी सभी पापों को नष्ट कर देती है और पर्यवेक्षक को अपराध से मुक्त करती है। इस एकादशी को पूरी श्रद्धा के साथ मनाने से व्यक्ति कभी भी बुरी आत्माओ या भूत प्रेतों से प्रभावित नहीं होता। पापमोचनी एकादशी के पालनकर्ता को हिंदू तीर्थ स्थानों पर जाने व एक हजार गायों का दान करने से भी अधिक फल की प्राप्ति होती है। इस व्रत का पालन करने वाले सभी सांसारिक सुखों का आनंद प्राप्त करते हैं और अंततः भगवान विष्णु के स्वर्गीय धाम 'वैकुंठ' में स्थान पाते हैं। पापमोचनी उपवास रखने का मुख्य उद्देश्य एक व्यक्ति के शरीर की जरूरतों को नियंत्रित करना और भगवान विष्णु को समर्पित वैदिक मंत्रों का उच्चारण, श्रवण और पाठ करना है।

 

पापमोचनी व्रत कथा

प्राचीन दिनों में, चित्ररथ नाम का एक जंगल था। गंधर्व बालिकांए और देवता, सभी यहाँ आनंद लेते थे और खिलखिलाते थे। एक बार, मेधवी नाम का एक ऋषि जंगल में, ध्यान कर रहा था। तब, मंजूघोषा नामक एक अप्सरा ऋषि पर मोहित हो गई। उसने अपनी सुंदरता और नृत्य से उसे आकर्षित करने की कोशिश की। उस समय कामदेव भी वहीं से गुजर रहे थे। यहां तक ​​कि कामदेव ने भी इस काम में अप्सरा की मदद की। परिणामस्वरूप, ऋषि का ध्यान तोड़ने में अप्सरा सफल रही।

कुछ वर्षों के बाद, जब ऋषि आकर्षण और भ्रम से बाहर आए, तो उन्हें याद आया कि वह भगवान शिव के लिए ध्यान कर रहे थे। उसने अपनी हालत के लिए अप्सरा को दोषी ठहराया और, उन्होंने अप्सरा को एक महिला दानव होने का श्राप दे दिया। श्राप सुनकर मंजूघोषा कांपने लगी और ऋषि के पैरों में गिर पड़ी। उसने इस श्राप के लिए क्षमा और उपाय पूछा। फिर, ऋषि ने उन्हें पापमोचनी एकादशी के व्रत का पालन करने के लिए कहा। अपने पाप से मुक्त होने के लिए ऋषि ने भी इस व्रत का पालन किया। व्रत पूरा होने पर दोनों को अपने पाप से मुक्ति मिली।

उसी समय से इस व्रत के पालन की परंपरा चली आ रही है। यह व्रत व्यक्ति को जाने-अनजाने में किए गए उसके सभी पापों से मुक्त कर देता है।

 

पापमोचनी एकादशी व्रत विधि

एकादशी के व्रत में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। पापमोचनी एकादशी के व्रत का पालन करने वाले व्यक्ति को दशमी तिथि (एकादशी के एक दिन पहले) को सात्विक भोजन (बिना प्याज और लहसुन आदि के भोजन) करना चाहिए। एकादशी व्रत का व्रत 24 घंटों तक रहता है। इसलिए, एक व्यक्ति को उपवास शुरू करने से पहले खुद को मानसिक रूप से तैयार करने की आवश्यकता होती है। एकादशी के दिन भगवान विष्णु को याद किया जाता है और ध्यान किया जाता है। और, पूरी रात विष्णु पाठ पढ़कर जागरण किया जाता है।

व्रत का पालन करने वाले व्यक्ति को सूर्योदय के समय जागना चाहिए और अपने नियमित कार्यों को पूरा करना चाहिए। फिर, व्रत का संकल्प लेकर करनी चाहिये और भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। अब, व्यक्ति को भगवान विष्णु की मूर्ति के सामने बैठना चाहिए और श्रीमद् भागवत कथा का पाठ करना चाहिए। पूरे दिन उपवास करने के बाद, रात में जागरण करें।

व्यक्ति को व्रत के दिन भोग-विलास का त्याग करना चाहिए। उसे अपने मन में किसी भी प्रकार के बुरे विचार रखने से बचना चाहिए। व्रत के दिन व्रत कथा अवश्य सुननी चाहिए।

द्वादशी (एकादशी के एक दिन बाद) पर, व्रत रखने वाले व्यक्ति को सुबह जल्दी स्नान करना चाहिए, फिर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिये और ब्राह्मणों को भोजन और भिक्षा देनी चाहिए। इन सभी चीजों को पूरा करने के बाद, भोजन ग्रहण करना चाहिए। इस तरह यह व्रत पूर्ण हो जाता है।

 

 



According to the Hindu calendar, Papmochani Ekadashi falls on the Ekadashi (eleventh day) of the month of Chaitra during Krishna Paksha. It is considered to be the last of all 24 Ekadashis, which falls between two main festivals, Holika Dahan and Chaitra Navratri.

 

Importance of Papmochani Ekadashi:

The importance of Papmochani Ekadashi is described in texts like 'Bhavyaottara Purana' and 'Harivasara'. Its importance was first attributed to King Mandhata by the sage Lomasa and then by Lord Krishna to the Pandavas, among them also its greatest king Yudhishthira. It is believed that Papmochani Ekadashi destroys all sins and frees the observer from crime. By celebrating this Ekadashi with full devotion, the person is never affected by evil spirits or very dear ones. Papmochani is more fruitful for a follower of Ekadashi than going to Hindu pilgrimage centers and donating a thousand cows. Those observing this fast enjoy all the worldly pleasures and eventually find a place in the 'Vaikuntha', the heavenly abode of Lord Vishnu. The main purpose of keeping papmochani fast is to control the needs of a person's body and to recite, listen and recite Vedic mantras dedicated to Lord Vishnu.

 

Papmochani Fast Story

In ancient days, there was a forest named Chitratha. Gandharva girls and deities all enjoyed and blossomed here. Once, a sage named Medhavi was meditating in the forest. Then, an apsara named Manjughosha was fascinated by the sage. He tried to charm her with her beauty and dance. At that time, Cupid was also passing by. Even Cupid helped Apsara in this work. As a result, Apsara was successful in breaking the sage's attention.

After a few years, when the sage came out of attraction and confusion, he remembered that he was meditating for Lord Shiva. He blamed Apsara for his condition and, he cursed Apsara for being a female demon. Hearing the curse, Manjugosha began to tremble and fell at the sage's feet. He asked forgiveness and remedy for this curse. Then, the sage asked him to observe the fast of Papmochani Ekadashi. The sage also observed this fast to get rid of his sins. Both got relief from their sins on completion of the vow.

Since that time, the tradition of observing this fast has been going on. This fast frees a person from all sins committed inadvertently.

 

Papmochani Ekadashi Fasting Method

Lord Vishnu is worshiped during Ekadashi fast. A person observing the fast of Papmochani Ekadashi should eat satvik food (food without onion and garlic etc.) on Dashami Tithi (one day before Ekadashi). Ekadashi fasting lasts for 24 hours. Therefore, a person needs to prepare himself mentally before starting a fast. Lord Vishnu is remembered and meditated on Ekadashi. And, the whole night is recited by reciting Vishnu text.

The person observing the fast should wake up at sunrise and complete his regular tasks. Then, the fast is resolved and Lord Vishnu is worshiped. Now, one should sit in front of the idol of Lord Vishnu and recite the Srimad Bhagwat Katha. After fasting all day, awaken at night.

One should sacrifice indulgence on the day of fasting. He should avoid having any kind of bad thoughts in his mind. The fast story must be heard on the day of fasting.

On Dwadashi (one day after Ekadashi), the person observing the fast should bathe early in the morning, then worship Lord Vishnu and provide food and alms to Brahmins. After completing all these things, food is consumed. In this way, this fast is completed.

 
 
 
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