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सुन्दरकाण्ड - सुन्दरकाण्ड
भाग - 11

दो0- भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि  बृंद
सीतहि  त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद ।। 10 ।।

त्रिजटा  नाम राच्छसी एका । राम चरन रति निपुन बिबेका ।।
सबन्हौ बोलि सुनाएसि  सपना । सीतहि सेइ करहु हित अपना ।।
सपनें  बानर  लंका जारी । जातुधान सेना सब मारी ।।
खर आरूढ़ नगन दससीसा । मुंडित  सिर खंडित भुज बीसा ।।
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई । लंका मनहुँ बिभीषन पाई ।।
नगर फ़िरी रघुबीर  दोहाई । तब प्रभु सीता बोलि प ाई ।।
यह सपना मैं कहउँ पुकारी । होइहि  सत्य गएँ दिन  चारी  ।।
तासु बचन सुनि ते सब डरीं । जनकसुता  के चरनन्हि  परीं ।।

 
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