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सुन्दरकाण्ड - सुन्दरकाण्ड
भाग - 13

सो0- कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब ।
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उ ि कर गहेउ ।। 12 ।।

तब देखी मुद्रिका मनोहर । राम नाम अंकित अति सुंदर ।।
चकित चितव मुदरी पहिचानी । हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी ।।
जीति को सकइ अजय रघुराई । माया तें असि रचि नहिं जाई ।।
सीता मन बिचार कर नाना । मधुर बचन बोलेउ हनुमाना ।।
रामचंद्र गुन बरनैं लागा । सुनतहिं सीता कर दुख भागा ।।
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई । आदिहु तें सब कथा सुनाई ।।
श्रवनामृत  जेहिं कथा सुहाई । कही सो प्रगट होति किन भाई ।।
तब हनुमंत निकट चलि  गयऊ । फ़िरि बै ीं मन बिसमय भयऊ ।।
राम दूत मैं मातु जानकी । सत्य सपथ करूनानिधान की ।।
यह मुद्रिका मातु मैं आनी । दीन्हि  राम तुम्ह कहँ सहिदानी ।।
नर बानरहि संग कहु कैसें । कही कथा भइ संगति जैसें ।।

 
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