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सुन्दरकाण्ड - सुन्दरकाण्ड
भाग - 15

दो0- रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर
अस कहि कपि  गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर ।। 14 ।।

कहेउ राम बियोग तव सीता । मो कहुँ सकल भए बिपरीता ।।
नव तरू किसलय मनहुँ  कृसानू । कालनिसा सम निसि ससि भानू ।।
कुबलय बिपिन  कुंत बन सरिसा । बारिद तपत तेल जनु बरिसा ।।
जे  हित रहे  करत तेइ पीरा । उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा ।।
कहेहू तें कछु दुख घटि होई । काहि  कहौं यह जान न कोई ।।
तत्व प्रेम कर मम अरू तोरा । जानत प्रिया एकु मनु मोरा ।।
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं ।  जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं ।।
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही । मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही ।।
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता । सुमिरू राम सेवक सुखदाता ।।
उर आनहु रघुपति प्रभुताई । सुनि मम बचन तजहु कदराई ।।

 
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