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सुन्दरकाण्ड - सुन्दरकाण्ड
भाग - 17

दो0- सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल ।
प्रभु प्रताप तें गरूड़हि खाइ खाइ परम लघु ब्याल ।। 16 ।।

मन संतोष सुनत कपि बानी । भगति प्रताप तेज बल सानी ।।
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना । होहु तात बल सील निधना ।।
अजर अमर गुननिधि होहू । करहुँ बहुत रघुनायक छोहू ।।

करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना । निर्भर प्रेम मगन हनुमाना ।।

बार बार नाएसि पद सीसा । बोला बचन जोरि कर कीसा ।।
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता । आसिष तव बमोघ बिख्याता ।।
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा । लागि देखि सुंदर फल रूखा ।।
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी । परम रजनीचर भारी ।।
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं । जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं ।।

 
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