दो0 - जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि । तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि ।। 21 ।। जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई ।। समर बालि सन करि जसु पावा । सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा ।। खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा । कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा ।। सब कें देह परम प्रिय स्वामी । मारहिं मोहि कुमारग गामी ।। जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे । तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे ।। मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा । कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा ।। बिनती करउँ जोरि कर रावन । सुनहु मान तजि मोर सिखावन ।। देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी । भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी ।। जाकें डर अति काल डेराई । जो सुर असुर चराचर खाई ।। तासों बयरू कबहुँ नहिं कीजै । मोरे कहें जानकी दीजै ।। |