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सुन्दरकाण्ड - सुन्दरकाण्ड
भाग - 24

दो0- मोहमूल बहु सुल प्रद त्यागहु तम अभिमान ।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान ।। 23 ।।

जदपि कही कपि अति हित बानी । भगति बिबेक बिरति नय सानी ।।
बोला बिहसि महा अभिमानी । मिला हमलि कपि गुर बड़ ग्यानी ।।
मृत्यु निकट आई खल तोही । लागेसि अधम सिखावन मोही ।।
उलटा होइहि कह हनुमाना । मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना ।।
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना । बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना ।।
सुनत निसाचर मारन धए । सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए ।।
नाइ सीस करि बिनय बहूता । नीति बिरोध न मारिअ दूता ।।
आन दंड कछु करिअ गोसाँई । सबहीं कहा मंत्रा भल भाई ।।
सुनत बिहसि बोला दसकंधर । अंग भंग करि प इअ बंदर ।।

 
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