दो0- कपि कें ममता पूँछपर सबहि कहउँ समुझाइ । तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ । 24 ।।
पूँछहीन बानर तहँ जाइहि । तब स निज नाथहि लइ आइहि ।। जिन्ह कै कीन्हिसि बहुत बड़ाई । देखउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई । बचन सुनत कपि मन मुसुकाना । भइ सहाय सारद मैं जाना ।। जातुधान सुनि रावन बचना।। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना ।। रहा न नगर बसन घृत तेला । बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला ।। कौतुक कहँ आए पुरबासी । मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी ।।
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी । नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी । पावक जरत देखि हनुमंता । भयउ परम लघु रूप तुरंता ।। निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं । भई सभीत निसाचर नारीं । |