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सुन्दरकाण्ड - सुन्दरकाण्ड
भाग - 27

दो0- पूछँ बुझाइ खोइ श्रम धरि लधु रुप बहोरि
जनकसुता कें आगें ाढ़ भयउ कर जोरि ।। 26 ।।

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा । जैसे रघुनायक मोहि दीन्हा ।।
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ । हरष  समेत पवनसुत लयऊ ।।
कहेहु तात अस मोर प्रनामा । सब प्रकार प्रभु पूरनकामा ।।
दीन दयाल बिरिदु संभारी । हरहु नाथ मम संकट भारी ।।
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु । बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु ।।
मास दिवस महुँ नाथु न आवा । तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा ।।
कहुँ कपि केहि बिधि राखौं प्राना । तुम्हहू तात कहत अब जाना ।।
तोहि देखि सीतलि भइ छाती । पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती ।।

 
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