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सुन्दरकाण्ड - सुन्दरकाण्ड
भाग - 28

दो0- जनक सुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह ।। 27 ।।
चलत महाधुनि गर्जेसि भारी । गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी ।।
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा । सबद किलिकिला कपिन्ह सुनाव ।।
हरषे सब बिलोकि हनुमाना । नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना ।।
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा । कीन्हेसि रामचंद्र  कर काजा ।।

मिले सकल अति भए सुखारी । तलफ़ल मीन पाव जिमि बारी ।।
चले हरषि रघुनायक पासा । पूँछत कहत नवल इतिहासा ।।
तब मधुबन भीतर सब आए । अंगद संमत मधु फ़ल खाए
रखवारे जब बरजन लागे । मुष्टि प्रहार हनत सब भागे ।।

 
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