दो0- जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज । सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज ।। 28 ।।
जौं न होति सीता सुधि पाई । मधुबन के फ़ल सकहिं कि खाई।। एहि बिधि मन बिचार कर राजा । आइ गए कपि सहित समाजा ।। आइ सबन्हि नावा पद सीसा । मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा ।। पूँछी कुसल कुसल पद देखी । राम कृपाँ भा काजु बिसेषी ।। नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना । राखे सकल कपिन्ह के प्राना ।। सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ । कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ ।। राम कपिन्ह जब आवत देखा । किएँ काजु मन हरष बिसेषा ।। फटिक सिला बै े द्वौ भाई । परे सकल कपि चरनन्हि जाई ।। |