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सुन्दरकाण्ड - सुन्दरकाण्ड
भाग - 35

दो0- कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ ।। 34 ।।

प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा । गर्जहिं भालु महाबल कीसा ।।
देखी राम सकल कपि सेना । चितइ कृपा करि राजिव नैना ।।
राम कृपा बल पाइ कपिंदा । भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा ।।
हरषि राम तब कीन्ह पयाना । सगुन भए सुंदर सुभ नाना ।।
जासु सकल मंगलमय कीति । तासु पयान सगुन यह नीती ।।
प्रभु पयान जाना बैदेहीं । फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं ।।
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई । असगुन भयउ रावनहि सोई ।।
चला कटकु को बरनै पारा । गर्जहिं बानर भालु अपारा ।।
नख आयुध गिरि पादपधरी । चले गगन महि इच्छाचारी ।।
केहरिनाद भालु कपि करहिं । डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं ।।

छं0 - चिक्करहिं दिग्गज डोल  महि गिरि लोल सागर खरभरे ।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर देख टरे ।।
कटकअहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं ।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ  गुन गन गावहीं ।। ।।
सहि सक न  भार  उदार अहिपति बार बारहिं मोहई ।
गह दसन पुनि पुनि कम पृष्ट क ोर सो किमि सोहई ।।
रघुबीर रूचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी ।
जनु कम खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी ।। ।।

 
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