दो0- सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि । ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि ।। 43 ।।
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू । आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू ।। सनमुख होइ जीव मोहि जबहिं । जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं ।। पापवंत कर सहज सुभाऊ । भजनु मोर तेहि भाव न काऊ ।।
जौं पै दुष्हृदय सोइ होई । मोरें सनमुख आव कि सोई ।। निर्मल मन जन सो मोहि पावा । मोहि कपट छल छिद्र न भावा ।। भेद लेन प वा दससीसा । तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा ।। जग महुँ सखा निसाचर जेते । लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते ।। जौं सभीत आवा सरनाईं । रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं ।। |