Subscribe for Newsletter
सुन्दरकाण्ड - सुन्दरकाण्ड
भाग - 44

दो0- सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि ।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि ।। 43 ।।

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू । आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू ।।
सनमुख होइ जीव मोहि जबहिं । जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं ।।
पापवंत कर सहज सुभाऊ । भजनु मोर तेहि भाव न काऊ ।।

जौं पै दुष्हृदय सोइ होई । मोरें सनमुख आव कि सोई ।।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा । मोहि कपट छल छिद्र न भावा ।।
भेद लेन प वा दससीसा । तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा ।।
जग महुँ सखा निसाचर जेते । लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते ।।
जौं सभीत आवा सरनाईं । रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं ।।

 
Sun Sign Details

Aries

Taurus

Gemini

Cancer

Leo

Virgo

Libra

Scorpio

Sagittarius

Capricorn

Aquarius

Pisces
Free Numerology
Enter Your Name :
Enter Your Date of Birth :
Ringtones
Find More
Copyright © MyGuru.in. All Rights Reserved.
Site By rpgwebsolutions.com