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सुन्दरकाण्ड - सुन्दरकाण्ड
भाग - 45

दो0- उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत ।
जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समेत ।। 44 ।।

सादर तेहि आगें करि बानर । चले जहाँ रघुपति  करूनाकर ।।
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता । नयनानंद दान  के दाता ।।
बहुरि राम छबिधम  बिलोकी । रहेउ टुकि एकटक पल रोकी ।।
भुज प्रलंब कंजारून लोचन । स्यामल गात प्रनत भय मोचन ।।
सिंघ कंध आयत उर सोहा । आनन अमित मदन मन मोहा ।।
नयन नीर पुलकित अति गाता । नम धरि धीर  कही मृदु बाता ।।
नाथ दसानन कर मैं भ्राता । निसिचर बंस जनम सुरत्राता ।।
सहज पापप्रिय तामस देहा । जथा उलूकहि तम पर नेहा ।।

 
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