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सुन्दरकाण्ड - सुन्दरकाण्ड
भाग - 48

दो0- अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज ।
देखेउँ नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज ।। 47 ।।

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ । जान भसुंडि संभु गिरिजाऊ ।।
जौं नर होइ चराचर द्रोही । आवै सभय सरन तकि मोही ।।
तजि मद मोह कपट छल नाना । करउँ सद्य तेहि साधु समाना ।।
जननी जनक बंधु सुत दारा । तनु धनु भवन सुहृद परिवारा ।।
सब कै ममता ताग बटोरी । मम पद मनहि बाँध बरि डोरी ।।
समदरसी इच्छा  कछु नाहीं । हरष सोक भय नहिं मन माहीं ।।
अस सज्जन मम उर बस कैसें । लोभी हृदयँबसइ धनु जैसें ।।
तुम्ह सारिखे संत प्रिय  मोरें । धरउँ देह नहिं आन निहोरें ।।

 
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