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सुन्दरकाण्ड - सुन्दरकाण्ड
भाग - 5

दो0- तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ।। 4 ।।

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा । हृदयँ राखि कोसलपुर राजा ।।
गरल सुध रिपु करहिं मिताई । गोपद सिंधु अनल सितलाई ।।
गरूड़ सुमेरू रेनु सम ताही । राम कृपा करि चितवा जाही ।।
अति लघु रुप धरेउ हनुमाना । पै ा नगर  सुमिरि भगवाना ।।
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा । देखे जहँ तहँ अगनित जोधा ।।
गयउ दसानन मंदिर माहीं । अति बिचित्र कहि जात सो नाहिं ।।
सयन किएँ देखा कपि तेही । मंदिर महुँ न दीखि बैदेही ।।
भवन एक पुनि दीख सुहावा । हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा ।।

 
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