दो0- बिनय न मानत जलधि गए तीनि दिन बीति । बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति ।। 57 ।।
लछिमन बान सरासन आनू । सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू ।। स सन बिनय कुटिल सन प्रीति । सहज कुपन सन सुंदर नीती ।। ममता रत सन ग्यान कहानी । अति लोभी सन बिरित बखानी ।। क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा । ऊसर बीज बएँ फल जथा ।। अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा । यह मत लछिमन के मन भावा।। संधानेउ प्रभु बिसिख कराला । उ ी उदधि उर अंतर ज्वाला ।। मकर उरग झष गन अकुलाने । जरत जंतु जलनिधि जब जाने ।। कनक थार भरि मनि गन नाना । बिप्र रूप आयउ मजि माना ।। |