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सुन्दरकाण्ड - सुन्दरकाण्ड
भाग - 59

दो0- काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच ।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच ।। 58 ।।

सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे । छमहु नाथ सब अव्रुन मेरे ।।
गगन समीर अनल जल धरनी । इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी ।।
तव प्रेरित मायाँ उपजाए । सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए ।।
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई । सो तेहि भाँति रहें सुख लहई ।।
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही । मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही ।।
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी । सकल ताड़ना के अधिकारी ।।
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई । उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई ।।
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई । करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई ।।

 
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