दो0- रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ । नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराइ ।। 5 ।।
लंका निसिचर निकर निवासा । इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा ।। मन महुँ तरक करैं कपि लागा । तेहीं समय बिभीषनु जागा ।। राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा । हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा ।। एहि सन ह ि करिहउँ पहिचानी । साधु ते होइ न कारज हानी ।। बिप्र रूप धरि बचन सुनाए । सुनत बिभीषन उ ि तहँ आए ।। करि प्रनाम पूँछी कुसलाई । बिप्र कहहु निज कथा बुझाई ।। की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई । मोरें हृदय प्रीति अति होई ।। की तुम्ह रामु दीन अनुरागी । आयहु मोहि करन बड़भागी ।। ।। |