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सुन्दरकाण्ड - सुन्दरकाण्ड
भाग - 6

दो0- रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराइ ।। 5 ।।

लंका निसिचर निकर  निवासा । इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा ।।
मन महुँ तरक करैं कपि लागा । तेहीं समय बिभीषनु जागा ।।
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा । हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा ।।
एहि सन ह ि करिहउँ पहिचानी । साधु  ते होइ न कारज हानी ।।
बिप्र रूप धरि  बचन सुनाए । सुनत बिभीषन उ ि तहँ आए ।।
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई । बिप्र कहहु निज कथा बुझाई ।।
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई । मोरें हृदय प्रीति अति होई ।।
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी । आयहु मोहि करन बड़भागी ।।  ।।

 
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