दो0- सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ । जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपवाइ ।। 58 ।।
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई । लरिकाईं रिषि आसिष पाई ।। तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे । तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे ।। मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई । करिहउँ बल अनुमान सहाई ।। एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ । जेहिं यह सुजहु जोक तिहुँ गाइअ ।। एहिं सर मम उत्तर तट बासी । हतहु नाथ खल नर अघ रासी ।। सुनि कृपाल सागर मन पीरा । तुरतहिं हरी राम रनधीरा ।। देखी राम बल पौरूष भारी । हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी ।। सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा । चरन बंदि पाथोधि सिधावा ।।
छं0- निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ । यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ ।। सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना । तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत स मना ।। |