दो0- अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर । कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर ।। 7 ।।
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी । फ़िरहिं ते काहे न होहिं दुखारी ।। एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा । पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा ।। पुनि सब कथा बिभीषन कही । जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही ।। तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता । देखी चहउँ जानकी माता ।। जुगुति बिभीषन सकल सुनाई । चलेउ पवनसुत बिदा कराई ।। करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ । बन असोक सीता रह जहवाँ ।। देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा । बै ेहिं बीति जात निसि जामा ।। कृस तनु सीस जटा एक बेनी । जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी ।। |