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सुन्दरकाण्ड - सुन्दरकाण्ड
भाग - 9

दो0- निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन ।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन ।। 8 ।।
तरू पल्लव  महुँ रहा लुकाई । करइ बिचार करौं का भाई ।।
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा । संग नारि बहु किएँ बनावा ।।
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा । साम दान भय भेद देखावा ।।
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी । मंदोदरी आदि सब रानी ।।
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा । एक बार बिलोकु मम ओरा ।।
तृन धरि  ओट कहति बैदेही । सुमिरि अवधपति  परम सनेही ।।
सुनु दसमुख खेद्योत प्रकासा । कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा ।।
अस मन समुझु कहति जानकी । खल सुधि नहिं रघुबीर बान की ।।

स सूनें हरि आनेहि  मोही । अधम  निलज्ज लाज नहिं तोही ।।

 
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