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सुन्दरकाण्ड - सुन्दरकाण्ड
भाग - 7

दो0- तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम  ।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम ।। 6 ।।

सुनहु पवनसुत  रहनि हमारी । जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी ।।
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा । करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा ।।
तामस तनु कछु साधन  नाहीं । प्रीति न पद सरोज मन माहीं ।।
अब मोहि भा भरोस हनुमंता । बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं संता ।।
जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा । तौ तुम्ह मोहि दरसु ह ि दीन्हा ।।
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती । करहिं सदा संवक पर प्रीती ।।
कहहु कवन मैं  परम कुलीना । कपि चंचल सबहीं बिधि हीना ।।
प्रात लेइ जो नाम हमारा । तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा ।।

 
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