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हरियाली तीज पर हरा रंग ही क्यों पहनती हैं महिलाएं~ जानें वजह

 
हरियाली तीज पर हरा रंग ही क्यों पहनती हैं महिलाएं~ जानें वजहInformation related to हरियाली तीज पर हरा रंग ही क्यों पहनती हैं महिलाएं~ जानें वजह.

सावन का महीना आते ही चारों तरफ हरियाली छा जाती है। पेड़ पौधे हरे भरे हो जाते हैं। बारिश की बूंदें धरती को नया रंग देती हैं। इसी मौसम में हरियाली तीज का त्योहार मनाया जाता है। यह त्योहार महिलाओं के लिए बहुत खास होता है। इस दिन महिलाएं सज संवर कर हरे रंग के कपड़े पहनती हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर हरा रंग ही क्यों चुना जाता है। आइए इसकी असली वजह जानते हैं।

हरियाली तीज क्या है

हरियाली तीज एक पारंपरिक त्योहार है। यह सावन महीने की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। इस दिन माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा होती है। मान्यता है कि इसी दिन माता पार्वती को भगवान शिव पति के रूप में मिले थे। इसलिए इस दिन को बहुत शुभ माना जाता है। सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं। कुंवारी लड़कियां भी अच्छे वर की कामना के लिए यह व्रत करती हैं।

हरियाली तीज कब मनाई जाती है

यह त्योहार हर साल सावन महीने में आता है। आमतौर पर यह जुलाई या अगस्त के महीने में पड़ता है। इसे श्रावण तीज भी कहा जाता है। सावन का महीना हरियाली और खुशियों का प्रतीक होता है। इसी वजह से इस त्योहार का नाम भी हरियाली से जुड़ा हुआ है।

हरा रंग पहनने की मुख्य वजह

अब बात करते हैं असली सवाल की। महिलाएं इस दिन हरा रंग ही क्यों पहनती हैं? इसके पीछे कई कारण हैं। नीचे कुछ मुख्य वजहें दी गई हैं।

  • प्रकृति से जुड़ाव~ सावन में चारों तरफ हरियाली फैली होती है। हरा रंग पहनकर महिलाएं इस मौसम का स्वागत करती हैं।

  • सुहाग की निशानी~ हरे रंग को सुहाग का रंग माना जाता है। यह पति की लंबी उम्र और खुशहाल वैवाहिक जीवन का प्रतीक है।

  • नई शुरुआत का संकेत~ हरा रंग नई शुरुआत और ताजगी दिखाता है। यह जीवन में नई उम्मीदों को जगाता है।

  • माता पार्वती को प्रिय रंग~ मान्यता है कि माता पार्वती को हरा रंग बहुत पसंद है। इसलिए महिलाएं उन्हें प्रसन्न करने के लिए हरे कपड़े पहनती हैं।

  • समृद्धि का प्रतीक~ हरा रंग खेतों की हरियाली और अच्छी फसल का भी संकेत देता है। यह घर में सुख-समृद्धि लाने की भावना से जुड़ा है।

इन सब वजहों के कारण हरियाली तीज पर हरा रंग पहनना एक परंपरा बन गई है। यह सिर्फ फैशन नहीं बल्कि आस्था का हिस्सा है।

हरी चूड़ियां और मेहंदी का महत्व

सिर्फ कपड़े ही नहीं बल्कि महिलाएं हरी चूड़ियां भी पहनती हैं। हाथों में मेहंदी रचाना भी इस त्योहार की खास परंपरा है। मेहंदी को सुहाग और प्रेम का प्रतीक माना जाता है। कई जगहों पर मान्यता है कि मेहंदी का गहरा रंग पति के प्यार को दिखाता है। हरी चूड़ियाँ भी सुहाग की निशानी होती हैं। इसलिए महिलाएं पूरे साज श्रृंगार में हरे रंग को प्राथमिकता देती हैं।

सिंधारा तीज की परंपरा

हरियाली तीज से पहले एक और खास रस्म निभाई जाती है जिसे सिंधारा तीज कहते हैं। इस दिन मायके से बेटी के लिए सिंधारा भेजा जाता है। सिंधारे में मिठाई, कपड़े, मेहंदी और श्रृंगार का सामान होता है। यह परंपरा बेटी के प्रति मायके का प्यार दिखाती है। कई परिवारों में यह रस्म आज भी बड़े प्रेम से निभाई जाती है।

छोटी तीज और बड़ी तीज में अंतर

लोग अक्सर पूछते हैं कि छोटी तीज और हरियाली तीज में क्या फर्क है। दरअसल हरियाली तीज को ही छोटी तीज कहा जाता है। इसके करीब पंद्रह दिन बाद कजरी तीज आती है जिसे बड़ी तीज कहते हैं। दोनों त्योहार अलग-अलग तारीखों पर मनाए जाते हैं, लेकिन दोनों का मकसद एक ही है। यह पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करना है।

हरियाली तीज व्रत के नियम

हरियाली तीज व्रत रखने के कुछ खास नियम होते हैं। महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं। इसके बाद साफ कपड़े पहनकर व्रत का संकल्प लेते हैं। पूरे दिन बिना अन्न और जल के व्रत रखा जाता है। शाम को माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा की जाती है। पूजा के बाद कथा सुनी जाती है। कई महिलाएं झूला झूलती हैं और गीत गाती हैं। यह त्योहार सिर्फ पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें उत्सव और खुशी का माहौल भी होता है।

झूला झूलने की परंपरा

सावन के महीने में झूला झूलना एक पुरानी परंपरा है। हरियाली तीज के दिन घरों के आँगन में या पेड़ों पर झूले डाले जाते हैं। महिलाएं और लड़कियां मिलकर झूला झूलती हैं। साथ में पारंपरिक गीत गाए जाते हैं। यह नजारा देखने में बहुत सुंदर लगता है। कई इलाकों में मेले भी लगते हैं जहां झूलों का खास इंतजाम होता है।

पूजा में क्या क्या रखा जाता है

पूजा की थाली सजाने का भी अपना महत्व है। इसमें कुछ खास चीजें शामिल की जाती हैं।

  • माता पार्वती और भगवान शिव की मूर्ति या तस्वीर

  • हरी चूड़ियां और मेहंदी

  • सोलह श्रृंगार का सामान

  • फल फूल और मिठाई

  • धूप दीप और अगरबत्ती

इन सामग्रियों के साथ विधिपूर्वक पूजा की जाती है। इसके बाद प्रसाद बांटा जाता है।

हरे रंग का वैज्ञानिक पहलू

धार्मिक मान्यता के अलावा हरे रंग का एक और पहलू भी है। हरा रंग आंखों को सुकून देता है। यह मन को शांत करता है और सकारात्मक ऊर्जा देता है। सावन के मौसम में प्रकृति भी हरे रंग से भरी होती है। इसलिए यह रंग इस मौसम के साथ बहुत अच्छे से मेल खाता है। यही वजह है कि यह रंग सिर्फ परंपरा ही नहीं बल्कि मन को भी अच्छा महसूस कराता है।

आज के समय में हरियाली तीज

आज भी शहरों और गांवों में यह त्योहार बड़े उत्साह से मनाया जाता है। बाजारों में हरे रंग के कपड़ों और चूड़ियों की खास मांग रहती है। महिलाएं एक दूसरे के घर जाकर सोलह श्रृंगार करती हैं। सोशल मीडिया पर भी इस त्योहार की झलक खूब देखने को मिलती है। समय बदल गया है, लेकिन इस त्योहार की परंपरा आज भी उतनी ही मजबूत है।

हरियाली तीज सिर्फ एक त्योहार नहीं बल्कि प्रेम, आस्था और परंपरा का संगम है। हरा रंग इस दिन सिर्फ पहनावा नहीं बल्कि भावनाओं की एक भाषा बन जाता है।


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