भारतीय हिंदी विक्रमी सम्वत पंचांग में प्रत्येक तीन साल के बाद में पुरुषोत्तम यानी अधिक मास की उत्पत्ति होती है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से इस माह में उपासना करने का अपना एक अलग ही महत्व है। माना जाता है कि इस माह के दौरान जप, तप, दान जैसे धार्मिक कार्यों से अनंत पुण्यों की प्राप्ति होती है।
इस माह में श्री कृष्ण कथा, श्रीमद्भगवतगीता, रामकथा का पाठ शुभ माना जाता है साथ ही श्रीहरि विष्णु भगवान की उपासना भी की जाती है। अधिक मास के विषय में मान्यता है कि हिंदी पंचांग में मास के कम-अधिक होने का कारण चंद्र मास होता है, मगर इसका निर्धारण सूर्य संक्रांति के आधार पर किया जाता है।
वैसे तो हर माह में संक्रांति अर्थात सूर्य का राशि परिवर्तन एक बार जरूर होता है जिसकी वजह से चंद्र मास की प्रक्रिया सुचारु रूप से चलती रहती है। किन्तु यदि किसी मास में 2 सौर संक्रांतियों का समावेश हो जाए तो उसे क्षय मास कहा जाता है जिसकी प्रतिपूर्ति के लिए फिर जिस माह में सूर्य संक्रांति का अभाव होता है, उसे 'अधिक मास' कहते हैं।
पंचांग गणना के अनुसार एक सौर वर्ष में 365 दिन, 15 घटी, 31 पल व 30 विपल होते हैं जबकि चन्द्र वर्ष में 354 दिन, 22 घटी, 1 पल व 23 विपल होते हैं। सूर्य वर्ष व चन्द्र वर्ष दोनों में 10 दिन, 53 घटी, 30 पल एवं 7 विपल का अंतर प्रत्येक वर्ष में रहता है। सूर्य वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच में हर साल आने वाले इस अंतर को प्रत्येक 3 वर्षों के बाद में अधिक मास के द्वारा सामान किया जाता है।
अधिक मास को भगवान श्री हरी विष्णु का प्रिय मास माना जाता है, इसीलिए उनके द्वारा इसे अपना नाम 'पुरुषोत्तम' दिया गया। यही वजह है कि ‘अधिक मास’ को 'पुरुषोत्तम मास' भी कहा जाता है।
अधिक मास की कथा : अधिक मास माहात्म्य का पाठ करने से भी पुण्यों की प्राप्ति होती है। इस माह में व्रत, दान, जप करने का दिव्य फल प्राप्त होता है। अधिक मास के दौरान जो व्यक्ति गेहूं, चावल, मूंग, जौ, मटर, तिल, ककड़ी, केला, आम, घी, सौंठ, इमली, सेंधा नमक, आंवले का भोजन करता है उसको जीवन में शारीरिक कष्टों का सामना नहीं करना पड़ता है। इन स्वास्थ्यवर्धक पदार्थों या इनसे बने अन्य खाद्य पदार्थों से व्यक्ति के जीवन में सात्विकता की वृद्धि होती हैं।
पुरुषोत्तम मास में अनुकरणीय नियम : उड़द, लहसुन, प्याज, राई, मूली, गाजर, मसूर की दाल, बैंगन, फूलगोभी, पत्तागोभी, शहद, मांस, मदिरा, धूम्रपान, मादक द्रव्य आदि का सेवन करना इस मास में अच्छा नहीं माना जाता है। अधिक मास के दौरान इनका सेवन तमोगुण में वृद्धि करने वाला माना जाता है।
पुरोषोत्तम माह में अधिक से अधिक संयम अर्थात ब्रह्मचर्य का पालन, फलों का सेवन, शुद्धता, पवित्रता, भगवत आराधना, एकासना, देवदर्शन, तीर्थयात्रा आदि अवश्य करना चाहिए। पुरुषोत्तम मास में सभी नियमों का अपने सामर्थ्य के अनुसार पालन करना चाहिए। अगर पूरे मास नियमो का पालन संभव न हो सके तो किसी एक पक्ष में तो अवश्य करना चाहिए।
यदि उसमें भी असमर्थ हों तो चतुर्थी, अष्टमी, एकादशी, प्रदोष, पूर्णिमा, अमावस्या को अवश्य देव कर्म करें। इन तिथियों पर संभव न हो तो एकादशी तथा पूर्णिमा को परिवार सहित कोई भी शुभ काम अवश्य करें।