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Nagarjun (Baba Nagarjun, Vaidya Nath Mishra, Yatri) (June 30, 1911 – November 4, 1998) was a major Hindi and Maithili poet who has also penned a number of novels, short stories, literary biographies and travelogues, and was known as Janakavi- the People's Poet.

Early life and education

Baba Nagarjun was Born as Vaidya Nath Mishra, in 1911, into a Maithil Brahmin family in a small village of Satlakha in Madhubani District of Bihar, India, which was his mother's village, his original village is Tarauni in Darbhanga district, Bihar. He later converted to Buddhism and got the name Nagarjun. His mother died when he was only three, and his father being a vagabond himself, couldn't support him so young Vaidya Nath thrived on the support of his relatives, and the scholarships he won on the account of him being an exceptional student. Soon he became proficient in Sanskrit, Pali and Prakrit languages, which he first learnt locally and later at Varanasi and Calcutta, where he was also semi-employed, while pursuing his studies. Meanwhile he married Aparajita Devi and the couple had six children.

He started his literary career with Maithili poems by the pen-name of Yatri (यात्री) in early 1930s. By mid 1930s, he started writing poetry in Hindi. His first permanent job of a full-time teacher, took him to Saharanpur (Uttar Pradesh), though he didn't stay there for long as his urge to delve deeper into Buddhist scriptures, took him to the Buddhist monastery at Kelaniya, Sri Lanka, where in 1935, he became a Buddhist monk, as needed to enter the monastery and study the scriptures, just as his mentor, Rahul Sankrityayan had done earlier, and hence took upon the name "Nagarjun". While at the monastery, he also studied Leninism and Marxism ideologies, before returning to India in 1938 to join 'Summer School of Politics' organized by noted peasant leader, Swami Sahajanand Saraswati, founder of Kisan Sabha. A wanderer by nature, Nagarjun spent a considerable amount of his time in the 30s and the 40s traveling across India.

He also participated in many mass-awakening movements before and after independence. Between 1939 and 1942, He was jailed by the British courts for leading a farmer's agitation in Bihar. For a long time after independence he was involved with journalism.

He played an active role in Jaya Prakash Narayan's movement prior to the Emergency period (1975–1977), and therefore was jailed for eleven months, during the emergency period. He was strongly influenced by Leninist-Marxist ideology. This was one of the reasons that he never found patronage from the mainstream political establishments.

He died in 1998 at the age of 87 in Darbhanga.

Style and influence

The subjects of his poetry are varied. Effects of both his wandering tendencies and activism, is evident in his middle and later works. His famous poems like Badal ko Ghirate Dekha hai (बादल को घिरते देखा है), is a travelogue in its own right. He often wrote on contemporary social and political issues. His famous poem Mantra Kavita (मंत्र कविता), is widely considered the most accurate reflection of a whole generation's mindset in India. Another such poem is Aao Rani Ham Dhoenge Palaki (आओ रानी हम ढोएंगे पालकी), which sarcastically humiliates the then prime minister of India, Jawaharlal Nehru, for the extravagant welcome thrown by him for Queen Elizabeth.

Besides these accepted subjects of poetry, Nagarjun found poetic beauty in unconventional subjects. One of his most astonishing works is a poem based on a female pig (मादा सूअर) called paine daanto wali (पैने दाँतो वाली). Another such creation is a series of poems on a full-grown jack fruit (कटहल).

Because of the breadth of his poetry, Nagarjun is considered the only Hindi poet, after Tulsidas, to have an audience ranging from the rural sections of society to the elite. He effectively freed poetry from the bounds of elitism.


Maithili was his mother tongue and he authored many poems, essays and novels in Maithili. He was educated in Sanskrit, Pali, and Hindi. Hindi remained the language of the bulk of his literature. The Hindi of his works varies from highly sanskritized to vernacular forms. He was a poet of the masses, and preferred to write in the language of immediate local impact. Therefore he never adhered to specific bounds of languages.

He also had good grasp of the Bengali language and used to write for Bengali newspapers. He was close to the Bengali Hungry generation or Bhookhi Peerhi poets and helped Kanchan Kumari in translating Malay Roy Choudhury's long poem JAKHAM in Hindi.


Nagarjun was given the Sahitya Akademi Award in 1969 for his historic book Patarheen Nagna Gachh, and the 'Bharat Bharati Award' by the Uttar Pradesh government for his literary contributions in 1983. He was also honored by the Sahitya Akademi Fellowship, India's highest literary award for lifetime achievement, in 1994.

Major literary works

    Satrange Pankhon Wali
    Talab ki Machhliyan
    Khichri Viplava Dekha Humne
    Hazar Hazar Bahon Wali
    Purani Juliyon Ka Coras
    Tumne Kaha Tha
    Akhir Aisa Kya Kah Diya Maine
    Is Gubare Ki Chhaya Mein.
    Yhe Danturit Muskan
    Mein Military Ka Boodha Ghoda
    Aise bhi hum kya
    Bhool jao purane sapne
    Apne Khet Mein Chandana


    Rati Nath Ki Chachi
    Baba Bateshar Nath
    Himalaya ki betiya
    Nai Paudh
    Varun Ke Bete
    Dukh Mochan
    Jamania Ka Baba
    Kumbhi Pak
    Paro and Asman Mein Chanda Tare.

Essay collections

    Ant Hinam Kriyanam.
    Bum Bholenath
    Ayodhya ka Raja

Maithili works

    Patrahin Nagna Gachh (collection of poems)
    citra(collection of poems)

His work on culture has been published in the form of books entitled Desh Dashkam and Krishak Dashkam.


नागार्जुन (३० जून १९११-५ नवंबर १९९८) हिन्दी और मैथिली के अप्रतिम लेखक और कवि थे। उनका असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था परंतु हिन्दी साहित्य में उन्होंने नागार्जुन तथा मैथिली में यात्री उपनाम से रचनाएँ कीं। इनके पिता श्री गोकुल मिश्र तरउनी गांव के एक किसान थे और खेती के अलावा पुरोहिती आदि के सिलसिले में आस-पास के इलाकों में आया-जाया करते थे। उनके साथ-साथ नागार्जुन भी बचपन से ही “यात्री” हो गए। आरंभिक शिक्षा प्राचीन पद्धति से संस्कृत में हुई किन्तु आगे स्वाध्याय पद्धति से ही शिक्षा बढ़ी। राहुल सांकृत्यायन के “संयुक्त निकाय” का अनुवाद पढ़कर वैद्यनाथ की इच्छा हुई कि यह ग्रंथ मूल पालि में पढ़ा जाए। इसके लिए वे लंका चले गए जहाँ वे स्वयं पालि पढ़ते थे और मठ के “भिक्खुओं” को संस्कृत पढ़ाते थे। यहाँ उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ले ली।

प्रकाशित कृतियाँ

छः से अधिक उपन्यास, एक दर्जन कविता-संग्रह, दो खण्ड काव्य, दो मैथिली;(हिन्दी में भी अनूदित) कविता-संग्रह, एक मैथिली उपन्यास, एक संस्कृत काव्य "धर्मलोक शतकम" तथा संस्कृत से कुछ अनूदित कृतियों के रचयिता।
कविता-संग्रह - अपने खेत में, युगधारा, सतरंगे पंखों वाली, तालाब की मछलियां, खिचड़ी विपल्व देखा हमने, हजार-हजार बाहों वाली, पुरानी जूतियों का कोरस, तुमने कहा था, आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने, इस गुबार की छाया में, ओम मंत्र, भूल जाओ पुराने सपने, रत्नगर्भ।
उपन्यास- रतिनाथ की चाची, बलचनमा, बाबा बटेसरनाथ, नयी पौध, वरुण के बेटे, दुखमोचन, उग्रतारा, कुंभीपाक, पारो, आसमान में चाँद तारे।
व्यंग्य- अभिनंदन
निबंध संग्रह- अन्न हीनम क्रियानाम
बाल साहित्य - कथा मंजरी भाग-१, कथा मंजरी भाग-२, मर्यादा पुरुषोत्तम, विद्यापति की कहानियाँ
मैथिली रचनाएँ- पत्रहीन नग्न गाछ (कविता-संग्रह), हीरक जयंती (उपन्यास)।
बांग्ला रचनाएँ- मैं मिलिट्री का पुराना घोड़ा (हिन्दी अनुवाद)
ऐसा क्या कह दिया मैंने- नागार्जुन रचना संचयन

नागार्जुन को १९६५ में साहित्य अकादमी पुरस्कार से उनके ऐतिहासिक मैथिली रचना पत्रहीन नग्न गाछ के लिए १९६९ में नवाजा गया था। उन्हें साहित्य अकादमी ने १९९४ में साहित्य अकादमी फेलो के रूप में नामांकित कर सम्मानित भी किया था।

नागार्जुन के काव्य में अब तक की पूरी भारतीय काव्य-परंपरा ही जीवंत रूप में उपस्थित देखी जा सकती है। उनका कवि-व्यक्तित्व कालिदास और विद्यापति जैसे कई कालजयी कवियों के रचना-संसार के गहन अवगाहन, बौद्ध एवं मार्क्सवाद जैसे बहुजनोन्मुख दर्शन के व्यावहारिक अनुगमन तथा सबसे बढ़कर अपने समय और परिवेश की समस्याओं, चिन्ताओं एवं संघर्षों से प्रत्यक्ष जुड़ा़व तथा लोकसंस्कृति एवं लोकहृदय की गहरी पहचान से निर्मित है। उनका ‘यात्रीपन’ भारतीय मानस एवं विषय-वस्तु को समग्र और सच्चे रूप में समझने का साधन रहा है। मैथिली, हिन्दी और संस्कृत के अलावा पालि, प्राकृत, बांग्ला, सिंहली, तिब्बती आदि अनेकानेक भाषाओं का ज्ञान भी उनके लिए इसी उद्देश्य में सहायक रहा है। उनका गतिशील, सक्रिय और प्रतिबद्ध सुदीर्घ जीवन उनके काव्य में जीवंत रूप से प्रतिध्वनित-प्रतिबिंबित है। नागार्जुन सही अर्थों में भारतीय मिट्टी से बने आधुनिकतम कवि हैं।  जन संघर्ष में अडिग आस्था, जनता से गहरा लगाव और एक न्यायपूर्ण समाज का सपना, ये तीन गुण नागार्जुन के व्यक्तित्व में ही नहीं, उनके साहित्य में भी घुले-मिले हैं। निराला के बाद नागार्जुन अकेले ऐसे कवि हैं, जिन्होंने इतने छंद, इतने ढंग, इतनी शैलियाँ और इतने काव्य रूपों का इस्तेमाल किया है। पारंपरिक काव्य रूपों को नए कथ्य के साथ इस्तेमाल करने और नए काव्य कौशलों को संभव करनेवाले वे अद्वितीय कवि हैं। उनके कुछ काव्य शिल्पों में ताक-झाँक करना हमारे लिए मूल्यवान हो सकता है। उनकी अभिव्यक्ति का ढंग तिर्यक भी है, बेहद ठेठ और सीधा भी। अपनी तिर्यकता में वे जितने बेजोड़ हैं, अपनी वाग्मिता में वे उतने ही विलक्षण हैं। काव्य रूपों को इस्तेमाल करने में उनमें किसी प्रकार की कोई अंतर्बाधा नहीं है। उनकी कविता में एक प्रमुख शैली स्वगत में मुक्त बातचीत की शैली है। नागार्जुन की ही कविता से पद उधार लें तो कह सकते हैं-स्वागत शोक में बीज निहित हैं विश्व व्यथा के।  भाषा पर बाबा का गज़ब अधिकार है। देसी बोली के ठेठ शब्दों से लेकर संस्कृतनिष्ठ शास्त्रीय पदावली तक उनकी भाषा के अनेकों स्तर हैं। उन्होंने तो हिन्दी के अलावा मैथिली, बांग्ला और संस्कृत में अलग से बहुत लिखा है। जैसा पहले भाव-बोध के संदर्भ में कहा गया, वैसे ही भाषा की दृष्टि से भी यह कहा जा सकता है कि बाबा की कविताओं में कबीर से लेकर धूमिल तक की पूरी हिन्दी काव्य-परंपरा एक साथ जीवंत है। बाबा ने छंद से भी परहेज नहीं किया, बल्कि उसका अपनी कविताओं में क्रांतिकारी ढंग से इस्तेमाल करके दिखा दिया। बाबा की कविताओं की लोकप्रियता का एक आधार उनके द्वारा किया गया छंदों का सधा हुआ चमत्कारिक प्रयोग भी है।

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