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Karwa Chauth~करवा चौथ - करवाचौथ व नई पीढ़ी

समय और समाज में आ रहे बदलावों के साथ-साथ हमारे तीज त्योहार भी बदल रहे हैं। पति की लंबी आयु के लिए किया जाने वाला व्रत करवाचौथ अब लोक परंपरा ही नहीं रह गया है, बल्कि इसमें आज की युवा पीढ़ी ने नए रंग भरे हैं। आज की कामकाजी महिला करवाचौथ का व्रत तो रखती है, लेकिन उसके बीच वह इस बात का भी ध्यान रखती है कि उसके रोजमर्रा के शडय़ूल पर इसका कोई फर्क न पड़े। 

 

कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी पर उत्तर भारतीय परिवारों- खासकर उत्तर-प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, बिहार और मध्य प्रदेश में करवाचौथ का पर्व पूरी परंपरा और उल्लास से मनाया जाता है। शिव-पार्वती युगल हमारे पौराणिक साहित्य के सबसे आदर्श और सबसे आकर्षक युगल हैं और इसीलिए हमारे यहां पति-पत्नी के बीच के सारे पर्व और त्योहार शिव और पार्वती से जुड़े हुए हैं। चाहे वह हरतालिका तीज हो, मंगलागौरी, जया-पार्वती हो या फिर करवा चौथ ही क्यों न हो।

 

अपने पति के स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए किया जाने वाला यह व्रत हर विवाहित स्त्री के जीवन में एक नई उमंग लाता है। कुंवारी लड़की अपने लिए शिव की तरह प्रेम करने वाले पति की कामना करती है और इसके लिए सोमवार से लेकर जया-पार्वती तक के सभी व्रत पूरी आस्था से करती है। इसी तरह करवा चौथ का संबंध भी शिव और पार्वती से है।

 

परंपरा में अब एक नया मोड़

 

अब पति भी व्रत करते हैं। यह परंपरा का विस्तार है। इस पर्व को अब सफल और खुशहाल दाम्पत्य की कामना के लिए किया जा रहा है। यह चलन और पक्का होता जा रहा है। इसीलिए करवाचौथ अब केवल लोक-परंपरा नहीं रह गई है। पौराणिकता के साथ-साथ इसमें आधुनिकता का प्रवेश हो चुका है और अब यह त्योहार भावनाओं पर केंद्रित हो गया है। हमारे समाज की यही खासियत है कि हम परंपराओं में नवीनता का समावेश लगातार करते रहते हैं। कभी करवाचौथ पत्नी के, पति के प्रति समर्पण का प्रतीक हुआ करता था, लेकिन आज यह पति-पत्नी के बीच के सामंजस्य और रिश्ते की ऊष्मा से दमक और महक रहा है। आधुनिक होते दौर में हमने अपनी परंपरा तो नहीं छोड़ी है, अब इसमें ज्यादा संवेदनशीलता, समर्पण और प्रेम की अभिव्यक्ति दिखाई देती है। दोनों के बीच अहसास का घेरा मजबूत होता है, जो रिश्तों को सुरक्षित करता है।

 

कॉरपोरेट जेनरेशन

 

सुहाग की कुशल कामना का पर्व करवाचौथ तो आज भी कायम है, लेकिन बदले स्वरूप के साथ। कॉरपोरेट जेनरेशन की महिलाएं भी अपने सुहाग के प्रति उतनी ही प्रतिबद्ध हैं, लेकिन उनके सुहाग यानी पतिदेव की भावनाओं में जबरदस्त परिवर्तन आया है। महानगर में कई युगल ऐसे हैं, जहां पति भी अपनी पत्नी के साथ करवाचौथ का व्रत करते हैं और उसके बाद रात को किसी रेस्तरां में रोमांटिक डिनर के लिए जाते हैं। यानी एक वर्ग ऐसा भी है, जो करवाचौथ पर करवा, बायना, परंपरागत पकवान और सात भाइयों की बहन की कहानी से दूर होते हुए भी उसे बस फीलिंग्स के साथ मना रहा है। यानी उसका मूल तत्त्व प्रेम और समर्पण तो वैसे ही मौजूद है पर कथा सुनने, निर्जल रहने, चांद को अर्ध्य देने और पति द्वारा पानी पिलाए जाने जैसी रस्में निभा पाना संभव नहीं है, क्योंकि नौकरी का शडय़ूल यह सब करने का मौका नहीं देता। इसीलिए रेस्तरां में खाने का चलन बढ़ा है। वहीं कई प्रमुख रेस्तरां इस अवसर के लिए खास सर्विग की भी व्यवस्था कर रहे हैं।  आज से कुछ समय पहले तक करवाचौथ के त्योहार को सुहागिनों के निर्जल व्रत के लिए जाना जाता था। महिलाएं व्रत रखती थीं और अपने पति की लंबी आयु की कामना करती थीं। रात को चांद देख कर पति के हाथ से जल पीकर व्रत पूरा करती थीं। लेकिन अब ऐसा नहीं है, बल्कि अब तो फ्रूट जूस तक पी लेने का चलन जोर पकड़ता जा रहा है।

 

 

 

 

सजती है हर कोई

 

दिनभर उपवास के बाद शाम को 18 साल की लड़की से लेकर 75 साल की महिला नई दुल्हन की तरह सजती-संवरती है। करवाचौथ के दिन एक खूबसूरत रिश्ता साल-दर-साल मजबूत होता है। कुंवारी लड़कियां (कुछ संप्रदायों में सगाई के बाद) शिव की तरह के पति की चाहत में, तो शादीशुदा स्त्रियां अपनी पति के स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए यह व्रत करती हैं। करवाचौथ पर सजने के लिए पंद्रह दिन पहले से ही बुकिंग होनी शुरू हो जाती है। ब्यूटी पार्लर अलग-अलग किस्म के पैकेज की घोषणा करते हैं। महिलाएं न सिर्फ उस दिन श्रृंगार कराने आती हैं, बल्कि प्री-मेकअप भी कराया जा रहा है। करवाचौथ पर मेहंदी का बाजार लाखों के पार बैठता है। सुबह से लेकर शाम तक महिलाएं अपने हाथों में मेहंदी लगवाने के लिए कतार में खड़ी रहती हैं।

 

 

गहनों की भी मांग बढ़ी

 

इस अवसर पर सोने व चांदी की बिक्री जबरदस्त तरीके से बढ़ी है। महिलाएं तो चांदी के बिछुए व पायल खरीदती हैं तो वहीं उनके पति उन्हें उपहार स्वरूप देने के लिए सोने के आभूषण खरीदते हैं। इस मौके पर जितनी साड़ी की बिक्री होती है उतनी कभी नहीं होती। खासतौर पर लाल, गुलाबी व सुनहरे रंग की साड़ियों की डिमांड ज्यादा होती है, लेकिन एक और अंतर नजर आ रहा है, वह यह कि अब कई युवतियां सुहाग की निशानी के लिए ही नहीं, बल्कि फैशन के लिए भी साड़ियां खरीद रही हैं, जिनमें सफेद व काला रंग भी काफी चलन में है।

 

करवाचौथ और नायिकाएं

 

हिंदी सिने जगत की नायिकाएं करवाचौथ का व्रत किस तरह रखती हैं? क्या वे भी आम महिलाओं की तरह दिनभर कुछ खाती-पीती नहीं? क्या उन्हें भी अपने पति से उपहार का इंतजार रहता है? क्या वे हाथों में मेहंदी लगवाती हैं? क्या वे भी पार्लर जाती हैं? ये सवाल सबके मन में हैं। ऐश्वर्या राय का पहला करवाचौथ कैसा था, इसका जीवंत नजारा पूरे देश ने देखा था। फिल्म ‘बागवान’ में अमिताभ बच्चन अपनी पत्नी हेमामालिनी के लिए करवाचौथ का व्रत रखते हैं। हर पारिवारिक सीरियल में करवाचौथ की कहानी बार-बार दुहराई जाती है। इन कहानियों में पति भी पत्नी के लिए करवाचौथ का व्रत रखते हैं। 
करवाचौथ का व्रत अब प्रेमी-प्रेमिका भी एक-दूसरे के लिए रखने लगे हैं। बॉलीवुड की दुनिया भी इन संस्कारों और आस्थाओं 
से मुक्त नहीं है। करिश्मा कपूर, रवीना टंडन, श्रीदेवी भी करवाचौथ का व्रत रखती हैं। राखी का स्वयंवर में राखी सावंत ने एक नहीं, बल्कि पांच-पांच लोगों के लिए करवाचौथ का व्रत रखा।

 

दोनों दे रहे हैं एक दूसरे को उपहार

 

जब पति-पत्नी दोनों ही एक दूसरे के लिए व्रत रख रहे हैं तो फिर उपहार का आदान-प्रदान भी होना लाजमी है। लिहाजा दोनों ही एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हुए उपहार खरीद रहे हैं, जिनमें कपड़े, एक्सेसरीज, किताबें, इलेक्ट्रॉनिक सामान और गहने तक शामिल हैं। प्रेमी-प्रेमिका भी इसी ट्रैंड को फॉलो कर रहे हैं।

 

पति व्यक्त कर रहे हैं अपनी भावनाएं

 

अब एकल परिवार होने से पति आसानी से अपनी भावनाएं व्यक्त कर देते हैं। संयुक्त परिवार में शायद चाह कर भी वे ऐसा नहीं कर पाते थे, क्योंकि ऐसा करना परंपरा का विरोध करना था। पुरानी पीढ़ी के लोगो में परंपरा के लिए पूर्वाग्रह बड़ा तीव्र होता है। महानगर में जहां पति व पत्नी दोनों ही कामकाजी हैं, वहां करवाचौथ पर रात के समय बाहर डिनर का चलन काफी है। दिनभर व्रत और ऑफिस करने के बाद अधिकतर पति चाहते हैं कि उनकी पत्नी को बना-बनाया लजीज खाना मिले, वह भी रोमांटिक ढंग से।

 


 
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