पितरों की विदाई गंगा में दीप दान करके की जाती है। पितर देव शत-शत आशीष देते हैं और उनकी कृपा से घर-परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है।
पितरों को देवताओं से भी श्रेष्ठ स्थान दिया गया है। हर साल के अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पितर धरती पर विराजते हैं। इस समयावधि को ही पितृपक्ष कहा जाता है। पितृपक्ष यानी कि पितरों का पखवाडा। इस पक्ष में पितरों के निमित तर्पण और पिंडदान करने की सनातनी परंपरा आदि काल से चली आ रही है।
अश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन उन पितरों के निमित तो श्राद्ध होता ही है, जिनकी मृत्यु अमावस्या तिथि को हुई थी। इसके अलावा अमावस्या को कुल के समस्त ज्ञात - अज्ञात पितरों के निमित भी श्राद्ध किया जाता है।
अमावस्या को श्राद्ध करने के बाद सूर्यास्त के समय पितरों की विदाई की जाती है। शास्त्रीय विधान के अनुसार इस दिन सूर्यास्त के समय गंगा तट पर चौदह दीप प्रज्वलित कर पितरों का सुमिरन करना चाहिए। इसके बाद दक्षिण दिशा की ओर मुंह कर दीपों को गंगा में प्रवाहित कर पितरों को विदाई करें।
गंगा तट नहीं होने की स्थिति पर पीपल के वृक्ष के चारों ओर दीप प्रज्वलित कर सकतें है।

