पितृपक्ष के समय पूजा अर्चना की विधि :
श्राद्ध के दौरान घर का मुखिया सूर्यमुख होकर बडी श्रद्धा से अपने पितरों का स्मरण करता है और कुश के सहारे अपनी अंजुलि से उन्हें जल का तर्पण करता है। तर्पण में फल, फूल, दूब, चावल आदि का भी प्रयोग किया जाता है। श्राद्ध करने वाला ब्राह्मणों और गरीबों को अपने अनुसार दूध, दही, घी व शहद आदि से तैयार भोजन कराता है।
कौवों को खाना :
कौवे को अन्य पक्षियों की अपेक्षा तुच्छ माना गया है, किंतु श्राद्धपक्ष में दही में डुबोकर पूरियां सबसे पहले उसी को दी जाती हैं। कौवे एवं पीपल को पितरों का प्रतीक माना गया है।
क्या करें
- पितृ श्राद्ध अपराह्य काल में करें
- आवश्यक वस्तुएं दान करें
- शुद्ध कुशा व जौ काले तिलों का प्रयोग करें
- नमक गुड़, तिल, चावल, वस्त्र, घी, स्वर्ण, भूमि व गौ आदि का दान करें
- पूर्ण ब्रह्मचर्य, शुद्ध आचरण और पवित्र विचार रखना चाहिए
- सफेद चंदन और सफेद पुष्प का प्रयोग करें
- कुत्तों द्वारा देखे गये भोजन का त्याग करें
- पशु-पक्षियों को भोजन कराएं
- गरीबों और ब्राह्मणों को अपने सामर्थ्यनुसार दान करें
- पितृस्त्रोत का पाठ करें
क्या ना करें
- शाम व रात्रि के समय श्राद्ध करना वर्जित माना जाता है
- श्राद्धकर्ता को श्राद्ध में लोहे के पात्र का प्रयोग नहीं करना चाहिए
- शुभ और कोई नए कार्य की शुरुआत न करें
- खाना बनाने में प्याज व लहसुन का प्रयोग न करें
- कुपित मन से खाना न बनाए