मान्यता है कि आश्विन मास के कृष्णपक्ष में यमराज सभी पितरों को अपने यहां से छोड़ देते हैं, ताकि वे अपनी संतान से श्राद्ध के निमित्त भोजन प्राप्त कर सकें। इस माह में श्राद्ध न करने वाले लोगो के अतृप्त पितर उन्हें श्राप देकर पितृलोक चले जाते हैं और आने वाली पीढ़ियों को भारी कष्ट उठाना पड़ता है।
गरुड़ पुराण में कहा गया है कि आयु: पुत्रान यश: स्वर्ग कीर्ति पुष्टि बलं श्रियम्, पशून सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृजूननात अर्थात श्राद्ध कर्म करने से संतुष्ट होकर पितर मनुष्यों के लिए आयु, पुत्र, यश, मोक्ष, स्वर्ग कीर्ति, पुष्टि, बल, वैभव, पशुधन, सुख, धन व धान्य वृद्धि का आशीष प्रदान करते हैं।
यमस्मृति में भी लिखा गया है कि पिता, दादा, परदादा तीनों पूर्वज श्राद्ध की ऐसे आशा रखते हैं, जैसे वृक्ष पर रहते हुए पक्षी वृक्षों में लगने वाले फलों की करते है। ब्राह्मण को पृथ्वी का भूदेव भी कहा गया है, उसकी जठराग्नि गव्य को पितरों तक पहुंचाने का कार्य करती है। पितृ जिस योनि में हों उसी रूप में अन्न उन्हें मिल जाता है इसलिए ब्राह्मण को भोजन कराने व दक्षिणा देकर संतुष्ट करने का भी विधान है।

