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Gangaur~गणगौर - गणगौर पर्व की धूम

'गण' का अर्थ है शिव और 'गौर' का अर्थ गौरी या पार्वती। स्पष्ट है कि गणगौर पर्व का संबंध शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना से है। कथा के अनुसार गौर अर्थात पार्वती का एक नाम रणुबाई भी है। रणुबाई का मायका मालवा और ससुराल राजस्थान में था। उनका मन मालवा में इतना रमता कि ससुराल रास नहीं आता था, पर विवाह के बाद उन्हें ससुराल जाना पड़ा। जब-जब भी वे मायके मालवा में आती थीं, मालवा की महिलाओं के लिए वे दिन एक उत्सव का माहौल रच देते थे। तभी से यह पर्व मनाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। 

 

चैत्र शुक्ल तृतीया को मनाए जाने वाले इस उत्सव से फूलपाती का पर्व भी जुड़ा है। महिलाएं, कुंवारी किशोरियां व युवतियां परंपरागत गीत गाती नदी, तालाब, कुंओं या बाग-बगीचों तक जाती हैं। वहां से कलश या लोटे में जल भरकर व फूल-पत्तियों से उसे सजाकर लेकर आती हैं, जिससे सुख-समृद्घि की कामना जुड़ी है।

लोक पर्व मालवा की संस्कृति को जीवंत बनाए हुए हैं। गणगौर पर्व इन्हीं में से एक है, जिसमें युवतियां अच्छे वर की आकांक्षा से तो सौभाग्यवती पति की दीर्घायु व सुख-समृद्घि की कामना से मनाती हैं। आज के व्यस्त जीवन में भी महिलाएं सोलह श्रृंगार से सज-धजकर पर्व को परंपरागत तरीके से उल्लासपूर्वक मनाती हैं। हालांकि परिवर्तन संसार का नियम है, लेकिन इस पर्व के मनाने के तरीकों में कोई खास बदलाव नहीं आया है। 

जैसा कि बड़े-बूढ़े करते आए हैं, उसी श्रद्घा के साथ नई पीढ़ी भी इन परंपराओं का पालन करती हैं। हां, साज-श्रृंगार का चलन जरूर बढ़ गया है। घर की जगह पार्लर में जाकर मेहंदी लगवाई जाती है। कहा जाता है कि जितना ज्यादा श्रृंगार और जेवर पहने जाते हैं, उतना ही सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। 

मिट्टी के सरावलों में जवारे बोकर उन्हें सींचा जाता है, पूजा की जाती है। प्रमुख दिन गणगौर को सजाकर पूजा की जाती है। सोने के गहने के रूप में बेसन के नमकीन तो चांदी के आभूषण गुड़-आटे से बनाकर चढ़ाए जाते हैं। 

यह गीत गाया जाता है- 

जव ना जवारा ने कंकू ना क्यारा तो जव म्हारा लेरिया ले जी
ईश्वरजी बोया ने रणुबई सींचिया तो जव म्हारा लेरिया ले जी

जवारों को बोते, सींचते और पूजते हुए परिवार के विवाहितों के नाम लिए जाते हैं।

 
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