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Festival - Yogini Ekadashi 2018 Date

Yogini Ekadasi happens throughout the melting away Moon in the month of Ashadha (June/July) and its glories are depicted in the Brahma Vaivarta Purana. Once Maharaj Yudhisthira enquired from Sri Krsna, O Supreme Lord! O Madhusudana! You have portrayed the impossible glories of Nirjala Ekadasi. Presently I a whole lot wish to find out about the Ekadasi that happens throughout the winding down Moon in the Ashadha month. The Personality of Godhead svayam-bhagavan Sri Krsna answered, My dear King, I will detail the Ekadasi that comes in the month of Ashadha and the magnificent results its recognition brings. This Ekadasi is referred to all as Yogini Ekadasi and it crushes all one most grave evil responses. It has the ability to convey one from the sea of material presence and is all promising.

O best of Kings, Yudhisthira! I will now portray a story from the Purana to delineate this great truth. Kuvera, the lord of Alakapuri was broadly dedicated to Lord Shiva. When he had a Yaksa cultivator named Hema who was wedded to Visalakshi. Visalakshi was known all around the district for her phenomenally supercilious excellence, immediately Hema was most caught by his wife allure. He would normally accumulate blossoms from the Manasa-sarovara lake and convey them to Kuvera for his puja to Lord Shankara. One day be that as it may, as opposed to offering them to Kuvera he stayed at home, caught in the tight servitude of his wife affection.

As a consequence of this, Kuvera did not get any blossoms on that day. Kuvera held up six extended periods for Hema to arrive. He was most infuriatingly exasperated subsequent to, because of the nonattendance of blooms he was unable to finish his love of Shiva. At last in the wake of testing his quietness to its breaking point Kuvera, the ruler of the Yakshas cried Send my courier to the house of the plant specialist Hema, discover what the fiend he supposes he playing at! And with that Kuvera sank into his seat, miserable at the turn of the day issues.After eventually the delivery person returned King Kuvera, Hema the nursery worker is getting a charge out of the companionship of his wife in his house. On listening to this current, Kuvera annoyance quadrupled in extent and he requested that Hema be brought before him instantly. On waking up Hema Mali developed embarrassed and trembling with apprehension he preceded lord Kuvera. He offered his aware obeisances, yet when he climbed he was not amazed to discover Kuvera eyes had become red with resentment and his whole body trembled with anger.

King Kuvera spoke out in anger - hey sinner! Unrighteous! Kami! You have disrespected God Lord Shiva of my beloved Lord Shiva, So I curse you and your woman will be separated and will be leprosy in the deceased. From the curse of Kuvera, hema gardener fell from heaven and he fell to the earth and then When he came to the earth, his skin became white leprosy. His wife got disappear. Hema will suffer many grief after coming to the earth, without food and water and going into a terrible forest. Night sleep had ended, but with the influence of Shiva  worship, there was no doubt about her memory of previous birth. On one go, he reached the ashram of the Markandeya Rishi, who was more aged than Brahma ji and whose ashram had seemed like a meeting house of Brahma. Hema gardener fell into his feet by reaching there.

Seeing his condition, Marcandeya sage said, What kind of a sin have you committed, due to which you have become such a state? Hema told his former accountant to the sage. Hearing this, the sage said - Surely you have spoken all the truthful words to me, So O Hama, I tell you a fast for salvation from this curse. If you practice the modules of ekadashi, named as Yogini of the Krishna Paksha of the month of Ashadh, then you will get rid of all sins. After hearing this Hema was very pleased and bowed to the monnk and bowed very humbly. Muni picked up Hema Mali with affection. Hema Mali practically followed the vow of Yogini Ekadashi, according to the sage. With the effect of this fast, Hem Mali got his old form and he kept living happily with his wife.

Lord Krishna said - O Rajan Yudhishthara! This fast of Yogini Ekadashi gives benefit to equivalent of giving food 88 thousand Brahmins. Through this great vow, all sin is eliminated and the human being attains human paradise.


योगिनी एकादशी हिन्दू विक्रमी सम्वत के आषाढ़ (जून / जुलाई) के महीने में चंद्रमा के पिघलने के दौरान होती है और इसकी महिमा ब्रह्मा वैवर्त पुराण में चित्रित की जाती है। एक बार महाराज युधिष्ठिर ने श्री कृष्ण से पूछा कि, हे परमपिता! हे मधुसूदन! आपने निर्जला एकादशी की असंभव महिमाओं को चित्रित किया है। वर्तमान में मैं एकदशी के बारे में जानना चाहता हूं जो आषाढ़ मास में चंद्रमा के नीचे घूमते हुए होता है। ईश्वरीय परमसत्ता के स्वामी स्वयं-भगवान श्री कृष्ण बोले, मेरे प्रिय राजन, मैं आषाढ़ मास में आने वाली एकादशी को विस्तार से कहूंगा और इसके अद्भुद परिणाम इसकी महत्ता सिद्ध करती है। इस एकादशी को योगिनी एकादशी के रूप में जाना जाता है और यह सभी गंभीर बुरी प्रक्रियाओं को कुचल देती है। इसमें मनुष्य को भौतिकता के समुद्र से निकालकर आध्यात्म की और आशान्वित करने की क्षमता है ।
 
हे राजाओ में श्रेष्ठ, युधिष्ठिर! अब मैं इस महान सत्य को दर्शाने के लिए पुराण से एक कहानी कहता हूँ। अलकापुरी के स्वामी कुबेर भगवान शिव के लिए  व्यापक रूप से समर्पित किया गया थे।उनके पास हेम नामक यक्ष किसान थे, जो विशालाक्षी से शादी कर चुके थे। विशालाक्षी जिले के चारों ओर अपने असाधारण घमंडी उत्कृष्टता के लिए जानी जाती थी। शादी के बाद हेम अपनी पत्नी के आकर्षण से मोहित हो गया। वह साधारणतः मनसा-सरोवारा झील से फूल एकत्र करके और उन्हें राजा कुबेर को ले जाकर देता था। राजा कुबेर अपनी पूजा के दौरान भगवान शंकर को ये फूल अर्पित करता था। एक दिन हेम राजा कुबेर के पास फूल लेकर नहीं पंहुचा, और अपनी पत्नी के स्नेह मोह में घर पर ही रहा।

परिणामस्वरूप, राजा कुबेर को उस दिन कोई फूल नहीं मिला। हेम के आने के लिए कुबेर ने छः बार बुलावा भेजा लेकिन हेम नहीं आया। अतः राजा कुबेर  हताश होकर क्रोध से उत्तेजित हो गया, क्योंकि वह हेम के कारण भगवान् शिव के अपने प्यार को पूरा नहीं कर पा रहा था। अंत में कुबेर ने अपने सब्र को त्यागकर, यक्षस के शासक ने एक सन्देश फूलो के विशेषज्ञ किसान हेम के घर भेजा, और सोचने लगा कि इसके पश्च्यात हेम की क्या प्रतिक्रिया होती है! और कुबेर दुखी होकर अपनी दैनिक समस्याओ में डूब गया।जब सन्देश लेकर गया व्यक्ति लौटकर आया हे राजन कुबेर, हेम अपने घर में अपनी पत्नी के साथ भोग में व्यस्त है। इस वृत्तांत को सुनकर, कुबेर की परेशानी चौगुनी  बढ़ गई और वह बोले कि हेम तुरंत उसके सामने लाया जाए। हेम माली जब अपनी गलती का अहसास हुआ तो वह शर्मिंदा होकर घबराहट के साथ थरथराता हुआ राजन कुबेर के पास आया। उसने अपनी गलती मानकर राजा को दंडवत प्रणाम किया और क्षमा मांगने की पेशकश की, फिर भी जब वह राजा के नजदीक पंहुचा तो वह आश्चर्यचकित नहीं था कि राजा कुबेर की आंखें क्रोध से लाल थी और उसका पूरा शरीर क्रोध से भर गया था।

राजा कुबेर क्रोधित होकर बोले - अरे पापी! अधर्मी! कामी! तूने मेरे परम पूजनीय देवो के देव भगवान् महादेव शिव का अनादर किया है, इस‍लिए मैं तुझे शाप देता हूँ कि तूझे स्त्री का वियोग होगा और मृत्युलोक में जाकर कोढ़ी हो जायेगा। कुबेर के शाप से हेम माली का स्वर्ग से पतन हो गया और वह तभी पृथ्वी पर गिर गया। मृत्युलोक में आकर उसके शरीर में श्वेत कोढ़ हो गया। उसकी पत्नी तभी अंतर्ध्यान हो गई। भूलोक पर आकर माली ने अनेक दु:ख भोगे, भयानक जंगल में जाकर बिना अन्न और जल के तड़पता रहा। रात्रि निद्रा भी समाप्त हो गयी थी, परंतु शिवजी की पूजा के प्रभाव से उसको पूर्व जन्म की स्मृति का ज्ञान अवश्य शेष रहा। घूमते-घ़ूमते एक दिन वह मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम पहुँच गया, जो ब्रह्मा जी से भी अधिक वृद्ध हो चुके थे और जिनका आश्रम ब्रह्मा की सभा के समान प्रतीत होता था। हेम माली वहाँ पहुंचकर उनके चरणों में गिर पड़ा।

उसकी ये स्थिति देखकर मारर्कंडेय ऋषि बोले तुमने कौन-सा ऐसा पाप किया है, जिसके कारण तुम्हारी ऐसी अवस्था हो गई है। हेम माली ने अपना पूर्व का वृत्तांत ऋषि से कहा। यह सुनकर ऋषि बोले- निश्चित ही तूने मेरे समक्ष सभी सत्य वचन कहे हैं, इसलिए हे हेम माली तेरे इस शाप से उद्धार के लिए मैं एक व्रत बताता हूँ। यदि तू आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की योगिनी नामक एकादशी का विधि विधानपूर्वक व्रत करेगा तो तुझे सभी पापो से मुक्ति मिल जायगी।ऐसा सुनकर हेम माली अति प्रसन्न हुआ और मुनि को दंडवत होकर साष्टांग प्रणाम किया। मुनि ने हेम माली स्नेह के साथ उठाया। हेम माली ने ऋषि के अनुसार बताये गये योगिनी एकादशी के व्रत का विधिपूर्वक पालन किया। इस व्रत के प्रभावफल से हेम माली ने अपने पुराने स्वरूप को प्राप्त कर वह अपनी पत्नी के साथ सुखपूर्वक रहने लगा।

प्रभु कृष्ण ने कहा- हे राजन युधिष्ठर! योगिनी एकादशी का यह व्रत 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन प्रशाद कराने के बराबर फल देता है। इस महान व्रत से संपूर्ण पाप समाप्त हो जाते हैं और अंतोगत्वा मानव स्वर्ग की प्राप्ति करता है।

 
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