Shani Jayanti

Shani Jayanti
This year's Shani Jayanti

Monday, 30 May - 2022

Shani Jayanti in the Year 2022 will be Celebrated on Monday, 30 May 2022.

Shani Jayanti is celebrated as the day on which Lord Shani was born or appeared on earth. This day is also known as Shanishchara Jayanti or as Sani Jayanthi. Lord Shani is one of the nine planets (Navagrahas) of Indian astrology. Navagrahas are the nine celestial deities in Hinduism. Lord Shani is also called as Shaneeswara, Sani dev, Sanischara Bhagwan or Chaya Putra. Lord Shani is the god of Shanivar (Saturday). Lord Shani is the son of Surya (Sun God) and his wife Chaya.

Shani Jayanti or Sani Jayanthi is observed on Amavasya (New moon day) in Vaishakh month or Vaisakha Masam. This day is also observed as Shani Amavasya. The Hindu religious devotees can do ordinary prayers at Shani Temples or Navagraha Temples. They can visit Lord Ganesha temples as it is regarded as very fortunate. It is to be noted that Shani Jayanti is celebrated in a grand manner in many temples such as all Navagraha Temples in Karnataka and Tamil Nadu, Sri Kalahasti Navagraha Temple, Mandapalli Mandeshwara Swamy Temple, Warangal Shaneeshwara Temple in Medak district of Andhra Pradesh. It is to be remembered that Sani Jayanthi is the most important festival in Shani Shingnapur Shaneshwara Mandir. In these said temples, a lot of rites and rituals are performed on Shani Jayanthi day so all the devotees can participate in these activities.

The Hindu religious devotees can observe fasting on this particular day. They can do fasting as observed on a saturday as Shanivar Vrat (Fast on Saturday). It is to be remembered that during Shani Trayodashi, Shani Amavasya and Shani Jayanthi days the devotees can perform Shani Shanti puja and Shani Thailabhishekam. The devotees can perform Shani puja. This particular puja can be done by those who are having Shani dosham. They can also conduct Shani homam or Yagya with the assistance of an acharya or purohit on these days. They can also indulge in Shani Shanti puja in order to solve the effect of Saturn in their horoscope. The devotees can fix the horseshoe U shaped on the main entrance door of the house, wear the horseshoe ring on the middle finger and install Shani Taitisa and mala in the chapel.

शनि जयंती शनिदेव भगवान का जन्मदिवस पृथ्वी पर अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन को शनिचर जयंती या शनि जयंती भी कहा जाता है। भगवान शनि भारतीय ज्योतिष के नौ ग्रहों (नवग्रह) में से एक गृह भी है। नवग्रहों को हिंदू धर्म में नौ दिव्य देवताओं के रूप में पूजा जाता हैं। भगवान शनि को शनिश्वर, शनिदेव, शनिचर भगवान् या छायापुत्र भी कहा जाता है। भगवान श्री शनिदेव शनिवार(दिवस) के भगवान् है और शनिवार के दिन इनकी पूजा की जाती है। भगवान श्री शनिदेव सूर्यदेव (सूर्य भगवान) और उनकी पत्नी छाया के पुत्र है।

वैशाख महीने या वैशाख मास की अमावस्या (नया चंद्रमा दिवस) तिथि को शनि जयंती मनाई जाती है। इस दिन को शनि अमावस्या के रूप में भी जाना जाता है। हिंदू धार्मिक भक्त शनि मंदिरों या नवग्रह मंदिरों में सामान्य प्रार्थना करते हैं। वे भगवान गणेश के मंदिर में भी जाते हैं क्योंकि इसे बहुत भाग्यशाली माना जाता है।इस दिन अनेक मंदिरो जैसे कर्नाटक और तमिलनाडु में सभी नवग्रहा मंदिर, श्री कालहस्ती नवरात्र मंदिर, मंडपल्ली मंडेश्वर स्वामी मंदिर, आंध्र प्रदेश के मेडक जिले में वर्गल शनेश्वर मंदिर में भव्य तरीको से शनि जयंती मनाई जाती है। यह ज्ञात रहे कि शनि जयंती शनि शिंगणेपुर शनिश्वर मंदिर में सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है। इन मंदिरों में, शनि जयंती पर्व के अवसर पर बहुत से संस्कार और अनुष्ठान किए जाते हैं ताकि सभी भक्त इन पूजन विधियों में भाग ले सकें।

हिंदू धार्मिक भक्त इस विशेष दिन उपवास रखते हैं। वे शनिवार व्रत के रूप में शनिवार के दिन मनाए गए उपवास की तरह शनि जयंती को उपवास रख सकते हैं। श्रद्धालु शनि त्रयौदाशी, शनि अमावस्या और शनि जयंती के दिन भक्त शांति शांति पूजा और शनि तैल अभिषेकम कर सकते हैं।श्रद्धालु भक्त शनि पूजा करते हैं। यह विशेष पूजा उन लोगों द्वारा की जा सकती है जिनकी कुंडली में शनि दोष होता हैं। वे इस दिन किसी आचार्य या पुरोहित के द्वारा शनि होम या यज्ञ का आयोजन भी करा सकते हैं। शनि के प्रभाव को कम करने के लिए वे शनि शांति पूजा में शामिल भी हो सकते हैं। श्रद्धालु भक्त घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर घोड़े की नाल (जूते) को लगा सकते हैं, बीच की अंगुली पर घोड़े की नाल की अंगूठी पहन सकते हैं और शनि तैंतीसा और माला स्थापित कर सकते हैं।
 
 
 
 
 
 
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