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Raskhan

Raskhan

Raskhan
Raskhan (born 1548 A.D.) was a poet who was both a Muslim and follower of Lord Krishna. His real name was Sayyad Ibrahim and is known to have lived in Amroha in
India. In his early years, he became a follower of Lord Krishna and learned the religion from Goswami Vitthalnath and began living in Vrindavan and spent his whole life
there. He died in 1628 A.D.

History
There are differences in the opinion of scholars regarding his year of birth. Estimates include 1615 and 1630, while some believes that Raskhan was born in 1558 and
died in 1628. Most of the scholars say Raskhan was a Pathan Sardar and his birthplace was Amroha in the Moradabad district. Hajari Prasad Dwivedi claims Raskhan was born Saiyad Ibrahim in his book, and that Khan was his title. Raskhan was the son of a Jagirdar. His family was wealthy, and he received a good education. Raskhan spoke both Hindi & Persian; he translated "Bhagavata Purana" into Persian. His shrine is located in Gokul near the Yamuna river, Bhramand Ghat. It is a very peaceful place.

Many Krishna devotees come there to pay their respects & meditate.

Subject matter
The poetry of Raskhan focuses on Lord Krishna. "Lilas" of Lord Krishna, such as Bal Lila, Chir Haran Lila, Kunj Lila, Ras Lila, Panghat Lila, and Dan Lila, were his favorite
subjects. Apart from Lilas, Raskhan has also created poems on Lord Shankar, Goddess Ganga, and the Holi festival.

Poetry
Raskhan is widely acknowledged as a great poet, having dedicated most of his creations to Lord Krishna. Sujan Raskhan and Prem Vatica are some of his available
creations. Raskhan Rachnavali is the collection of Raskhan's poetry. His creations describe the beauty of not only Lord Krishna but also his relations with his beloved
Radha.

रसखान एक कृष्ण भक्त मुस्लिम कवि थे। हिन्दी के कृष्ण भक्त तथा रीतिकालीन रीतिमुक्त कवियों में रसखान का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। रसखान को 'रस की खान' कहा गया है। इनके काव्य में भक्ति, शृंगार रस दोनों प्रधानता से मिलते हैं। रसखान कृष्ण भक्त हैं और उनके सगुण और निगुर्ण निराकार रूप दोनों के प्रति श्रद्धावनत हैं। रसखान के सगुण कृष्ण वे सारी लीलाएं करते हैं, जो कृष्ण लीला में प्रचलित रही हैं। यथा - बाललीला, रासलीला, फागलीला, कुंजलीला आदि। उन्होंने अपने काव्य की सीमित परिधि में इन असीमित लीलाओं को बखूबी बाँधा है। मथुरा में इनकी समाधि है।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने जिन मुस्लिम हरिभक्तों के लिये कहा था, "इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिन हिन्दू वारिए" उनमें रसखान का नाम सर्वोपरि है। वाहिद और आलम भी इसी परम्परा में आते हैं। सय्यद इब्राहीम "रसखान" का जन्म अन्तर्जाल पर उपलब्ध स्रोतों के अनुसार सन् १५३३ से १५५८ के बीच कभी हुआ था। चूँकि अकबर का राज्यकाल १५५६-१६०५ है, ये लगभग अकबर के समकालीन हैं। जन्मस्थान पिहानी कुछ लोगों के मतानुसार दिल्ली के समीप है। कुछ और लोगों के मतानुसार यह पिहानी उत्तरप्रदेश के हरदोई ज़िले में है। मृत्यु के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई। यह भी बताया जाता है कि रसखान ने भागवत का अनुवाद फारसी में किया।

परिचय
रसखानि का जन्म सवत्‌ 1615 के आसपास माना जाता है। संवत्‌ 1671 में इन्होंने 'प्रेमवाटिका' लिखी थी, जिसका प्रमाण यह है :

विधु, सागर, रस, इंदु सुभ, वरस सरस रसखानि।
प्रेमवाटिका रचि रुचिर, चिर हिय हरषि बखानि।।

एक मत यह भी है कि रसखानि का असली नाम सैयद इब्राहीम था, और यह पिहानी के रहनेवाले थे। परंतु '252 वैष्णवन की वार्ता' में इस बात का कोई उल्लेख नहीं है। यदि ऐसा होता तो यह अपने आपकों पठान न कहकर सैयद लिख देते, और दिल्ली के स्थान पर पिहानी। पिहानीवाले सैयद इब्राहीम एक दूसरे ही कवि थे और उनका भी उपनाम रसखानि था।

रसखानि ने इस्लाम को छोड़कर वैष्णव धर्म स्वीकार कर लिया था। गोसाईं विट्ठलनाथ के यह कृपापात्र शिष्य थे। '252 वैष्णयन की वार्ता' में इनकी भी वार्ता अर्थात्‌ कथा दी गई है।

सांसारिक प्रेम की सीढ़ी से चढ़कर रसखानि भगवदीय प्रेम की सबसे ऊँची मंजिल तक कैसे पहुँचे, इस संबंध की दो आख्यायिकाएँ प्रचलित हैं। 'वार्ता' में लिखा है कि रसखानि पहले एक बनिये के लड़के पर अत्यंत आसक्त थे। उसका जूठा तक यह खा लेते थे। एक दिन चार वैष्णव बैठे बात कर रहे थे कि भगवान्‌ श्रीनाथ जी से प्रीति ऐसी जोड़नी चाहिए, जैसे प्रीति रसखानि की उस बनिये के लड़के पर है। रसखानि ने रास्ते में जाते हुए यह बात सुन ली। उन्होंने पूछा कि 'आपके श्रीनाथ जी का स्वरूप कैसा है?' वैष्णवों ने श्रीनाथ जी का एक सुंदर चित्र उन्हें दिखाया। चित्रपट में भगवान्‌ की अनुपम छवि देखकर रसखानि का मन उधर से फिर गया। प्रेम की विह्वल दशा में श्रीनाथ जी का दर्शन करने यह गोकुल पहुँचे। गोसाई विट्ठलदास जी ने इनके अंतर के परात्पर प्रेम को पहचानकर इन्हें अपनी शरण में ले लिया। रसखानि श्रीनाथ जी के अनन्य भक्त हो गए।

दूसरी आख्यायिका यह है कि रसखानि एक रूपगर्विता स्त्री पर आसक्त थे। पर वह इनके प्रेम की सदा उपेक्षा ही करती थी। एक दिन श्रीमद्भागवत के फ़ारसी उल्थे में ब्रजगोपिकाओं के आत्यंतिक विरह का प्रसंग पढ़ते-पढ़ते यह सोचने लगे कि नंद के जिस फ़र्जद पर हज़ारों `हसीन गोपियाँ जान दे रही हैं, क्यों न उसी के साथ प्रीति जोड़ी जाए। जीवन का रास्ता मुड़ गया। 'प्रेमवाटिका' में यह स्वयं लिखते हैं -

तोरि मानिनी तें हियो, फोरि मोहिनी गान।
प्रेमदेव की छबिहिं लखि, भय मियां रसखान।।

इनकी कविताओं के दो संग्रह प्रकाशित हुए हैं - 'सुजान रसखान' और 'प्रेमवाटिका'। 'सुजान रसखान' में 139 सवैये और कवित्त है। 'प्रेमवाटिका' में 52 दोहे हैं, जिनमें प्रेम का बड़ा अनूठा निरूपण किया गया है। रसखानि के सरस सवैय सचमुच बेजोड़ हैं। सवैया का दूसरा

नाम 'रसखानि' भी पड़ गया है। शुद्ध व्रजभाषा में रसखानि ने प्रेमभक्ति की अत्यंत सुंदर प्रसादमयी रचनाएँ की हैं। यह एक उच्च कोटि के भक्त कवि थे, इसमें संदेह नहीं।

    मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं गोकुल गाँव के ग्वालन। जो पसु हौं तो कहा बसु मेरो चरौं नित नन्द की धेनु मंझारन। पाहन हौं तो वही गिरि को जो धरयौ कर छत्र पुरन्दर धारन। जो खग हौं बसेरो करौं मिल कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन।।

रसखान का अपने आराध्य के प्रति इतना गम्भीर लगाव है कि ये प्रत्येक स्थिति में उनका सान्निध्य चाहते हैं। चाहे इसके लिये इन्हें कुछ भी परिणाम सहना पडे। इसीलिये कहते हैं कि आगामी जन्मों में मुझे फिर मनुष्य की योनि मिले तो मैं गोकुल गाँव के ग्वालों के

बीच रहने का सुयोग मिले। अगर पशु योनि मिले तो मुझे ब्रज में ही रखना प्रभु ताकि मैं नन्द की गायों के साथ विचरण कर सकूँ। अगर पत्थर भी बनूं तो भी उस पर्वत का बनूँ जिसे हरि ने अपनी तर्जनी पर उठा ब्रज को इन्द्र के प्रकोप से बचाया था। पक्षी बना तो यमुना

किनारे कदम्ब की डालों से अच्छी जगह तो कोई हो ही नहीं सकती बसेरा करने के लिये।

इसी प्रकार रसखान ने समस्त शारीरिक अवयवों तथा इन्द्रियों की सार्थकता तभी मानी है, जिनसे कि वे प्रभु के प्रति समर्पित रह सकें।

जो रसना रस ना बिलसै तेविं बेहु सदा निज नाम उचारै।
मो कर नीकी करैं करनी जु पै कुंज कुटीरन देहु बुहारन।
सिध्दि समृध्दि सबै रसखानि लहौं ब्रज-रेनुका अंग सवारन।
खास निवास मिले जु पै तो वही कालिन्दी कूल कदम्ब की डारन।।

रसखान अपने आराध्य से विनती करते हैं कि मुझे सदा अपने नाम का स्मरण करने दो ताकि मेरी जिव्हा को रस मिले। मुझे अपने कुंज कुटीरों में झाडू लगा लेने दो ताकि मेरे हाथ सदा अच्छे कर्म कर सकें। ब्रज की धूल से अपना शरीर संवार कर मुझे आठों सिध्दियों का

सुख लेने दो। और यदि निवास के लिये मुझे विशेष स्थान देना ही चाहते हो प्रभु तो यमुना किनारे कदम्ब की डालों से अच्छी जगह तो कोई हो ही नहीं, जहाँ आपने अनेकों लीलाएं रची हैं।

रसखान के कृष्ण की बाललीला में उनके बचपन की अनेकों झाँकियां हैं।

धूरि भरै अति सोभित स्याम जु तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।
खेलत खात फिरै अँगना पग पैंजनी बाजती पीरी कछौटी।
वा छवि को रसखान विलोकत बारत काम कला निज कोठी।
काग के भाग बडे सजनी हरि हाथ सौं ले गयो रोटी।।

बालक श्यामजू का धूल से सना शरीर और सर पर बनी सुन्दर चोटी की शोभा देखने लायक है। और वे पीले वस्त्रों में, पैरों में पायल बांध माखन रोटी खेलते खाते घूम रहे हैं। इस छवि पर रसखान अपनी कला क्या, सब कुछ निछावर कर देना चाहते हैं। तभी एक कौआ

आकर उनके हाथ से माखन-रोटी ले भागता है तो रसखान कह उठते हैं कि देखो इस निकृष्ट कौए के भाग्य भगवान के हाथ की रोटी खाने को मिली है।

कृष्ण के प्रति रसखान का प्रेम स्वयं का तो है ही मगर वह गोपियों का प्रेम बन कृष्ण की बाल्यावस्था से यशोदा नन्द बाबा के प्रेम से आगे जा समस्त ब्रज को अपने प्रेम में डुबो ले जाता है। उनकी शरारतों की तो सीमा नहीं। वे गोपियों को आकर्षित करने के लिये विविध

लीलाएं करते हैं जैसे कभी बाँसुरी के स्वरों से किसी गोपी का नाम निकालते हैं। कभी रास रचते हैं, कभी प्रेम भरी दृष्टि से बींध देते हैं।

अधर लगाई रस प्याई बाँसुरी बजाय,
मेरो नाम गाई हाय जादू कियौ मन में।
नटखट नवल सुघर नन्दनवन में
करि कै अचेत चेत हरि कै जतम मैं।
झटपट उलटि पुलटी परिधान,
जानि लागीं लालन पे सबै बाम बन मैं।
रस रास सरस रंगीली रसखानि आनि,
जानि जोर जुगुति बिलास कियौ जन मैं।

एक गोपी अपनी सखि से कहती है कि कृष्ण ने अपने अधरों से रस पिला कर जब बाँसुरी में मेरा नाम भर कर बजाया तो मैं सम्मोहित हो गई। नटखट युवक कृष्ण की इस शरारत से अचेत मैं हरि के ध्यान में ही खो गई। और बांसुरी के स्वर सुन हर गोपी को लगा कि

उसे कृष्ण ने बुलाया है तो सब उलटे सीधे कपडे ज़ल्दी जल्दी पहन, समय का खयाल न रख वन में पहुँच गईं। तब रंगीले कृष्ण ने वहाँ आकर रासलीला की और नृत्य संगीत से आनंद का वातावरण बना दिया।

रंग भरयौ मुस्कात लला निकस्यौ कल कुंज ते सुखदाई।
मैं तबहीं निकसी घर ते तनि नैन बिसाल की चोट चलाई।
घूमि गिरी रसखानि तब हरिनी जिमी बान लगैं गिर जाई।
टूट गयौ घर को सब बंधन छुटियो आरज लाज बडाई।।

गोपी अपने हृदय की दशा का वर्णन करती है। जब मुस्कुराता हुआ कृष्ण सुख देने वाले कुंज से बाहर निकला तो संयोग से मैं भी अपने घर से निकली। मुझे देखते ही उसने मुझ पर अपने विशाल नेत्रों के प्रेम में पगे बाण चलाए मैं सह न सकी और जिस प्रकार बाण लगने

पर हिरणी चक्कर खा कर भूमि पर गिरती है, उसी प्रकार मैं भी अपनी सुध-बुध खो बैठी। मैं सारे कुल की लाज और बडप्पन छोड क़ृष्ण को देखती रह गई।

रसखान ने रासलीला की तरह फागलीला में भी कृष्ण और गोपियों के प्रेम की मनोहर झाँकियां प्रस्तुत की हैं।

खेलत फाग लख्यौ पिय प्यारी को ता मुख की उपमा किहिं दीजै।
दैखति बनि आवै भलै रसखान कहा है जौ बार न कीजै।।
ज्यौं ज्यौं छबीली कहै पिचकारी लै एक लई यह दूसरी लीजै।
त्यौं त्यौं छबीलो छकै छबि छाक सौं हेरै हँसे न टरै खरौ भीजै।।

एक गोपी अपनी सखि से राधा-कृष्ण के फाग का वर्णन करते हुए बताती है - हे सखि! मैं ने कृष्ण और उनकी प्यारी राधा का फाग खेलते हुए देखा है, उस समय की उस शोभा को कोई उपमा नहीं दी जा सकती। और कोई ऐसी वस्तु नहीं जो उस स्नेह भरे फाग के दृश्य

पर निछावर नहीं की जा सके। ज्यों ज्यों सुन्दरी राधा चुनौती दे देकर एक के बाद दूसरी पिचकारी चलाती हैं। वैसे वैसे छबीला कृष्ण उनके उस रंग भरे रूप को छक कर पीता हुआ वहीं खडा मुस्कुरा कर भीगता रहता है।

रसखान के भक्ति काव्य में अलौकिक निगुर्ण कृष्ण भी विद्यमान हैं। वे कहते हैं -

संभु धरै ध्यान जाकौ जपत जहान सब,
ताते न महान और दूसर अब देख्यौ मैं।
कहै रसखान वही बालक सरूप धरै,
जाको कछु रूप रंग अबलेख्यौ मैं।
कहा कहूँ आली कुछ कहती बनै न दसा,
नंद जी के अंगना में कौतुक एक देख्यौ मैं।
जगत को ठांटी महापुरुष विराटी जो,
निरजंन, निराटी ताहि माटी खात देख्यौ मैं।

शिव स्वयं जिसे अराध्य मान उनका ध्यान करते हैं, सारा संसार जिनकी पूजा करता है, जिससे महान कोई दूसरा देव नहीं। वही कृष्ण साकार रूप धार कर अवतरित हुआ है और अपनी अद्भुत लीलाओं से सबको चौंका रहा है। यह विराट देव अपनी लीला के कौतुक दिखाने

को नंद बाबा के आंगन में मिट्टी खाता फिर रहा है।

गावैं गुनि गनिका गंधरव औ नारद सेस सबै गुन गावत।
नाम अनंत गनंत ज्यौं ब्रह्मा त्रिलोचन पार न पावत।
जोगी जती तपसी अरु सिध्द निरन्तर जाहि समाधि लगावत।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावत।

जिस कृष्ण के गुणों का गुणगान गुनिजन, अप्सरा, गंर्धव और स्वयं नारद और शेषनाग सभी करते हैं। गणेश जिनके अनन्त नामों का जाप करते हैं, ब्रह्मा और शिव भी जिसके स्वरूप की पूर्णता नहीं जान पाते, जिसे प्राप्त करने के लिये योगी, यति, तपस्वी और सिध्द

निरतंर समाधि लगाए रहते हैं, फिर भी उस परब्रह्म का भेद नहीं जान पाते। उन्हीं के अवतार कृष्ण को अहीर की लडक़ियाँ थोडी सी छाछ के कारण दस बातें बनाती हैं और नाच नचाती हैं।

एक और सुन्दर उदाहरण -

वेही ब्रह्म ब्रह्मा जाहि सेवत हैं रैन दिन,
सदासिव सदा ही धरत ध्यान गाढे हैं।
वेई विष्णु जाके काज मानि मूढ राजा रंक,
जोगी जती व्हैके सीत सह्यौ अंग डाढे हैं।
वेई ब्रजचन्द रसखानि प्रान प्रानन के,
जाके अभिलाख लाख लाख भाँति बाढे हैं।
जसुदा के आगे वसुधा के मान मोचन ये,
तामरस-लोचन खरोचन को ठाढे हैं।

कृष्ण की प्राप्ति के लिये सारा ही जगत प्रयत्नशील है। ये वही कृष्ण हैं जिनकी पूजा ब्रह्मा जी दिन रात करते हैं। सदाशिव जिनका सदा ही ध्यान धरे रहते हैं। यही विष्णु के अवतार कृष्ण जिनके लिये मूर्ख राजा और रंक तपस्या करके सर्दी सहकर भी तपस्या करते हैं। यही

आनंद के भण्डार कृष्ण ब्रज के प्राणों के प्राण हैं। जिनके दर्शनों की अभिलाषाएं लाख-लाख बढती हैं। जो पृथ्वी पर रहने वालों का अहंकार मिटाने वाले हैं। वही कमल नयन कृष्ण आज देखो यशोदा माँ के सामने बची खुची मलाई लेने के लिये मचले खडे हैं।

वस्तुत: रसखान के कृष्ण चाहे अलौकिक हों पर वे भक्तों को आनंदित करने के लिये और उनके प्रेम को स्वीकार करने के लिये तथा लोक की रक्षा के लिये साकार रूप ग्रहण किये हैं।


मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरे पहिरौंगी।
ओढ़ि पितम्बर लै लकुटी, बन गोधन ग्वारन संग फिरौंगी।।
भावतो वोहि मेरो रसखान, सो तोरे कहे सब स्वाँग भरौंगी।
या मुरली मुरलीधर की, अधरान धरी अधरा न धरौंगी।।

(गोपी कहती है) सिर के ऊपर मोरपंख रखूँगी, गुंजों (गुंजा या घुमचिल लाल और काले रंग का एक बहुत छोटा पत्थर है जिसका वज़न एक रत्ती माना जाता है) की माला गले में पहिनूँगी। पीताम्बर ओढ़ कर वन में गायों और ग्वालों के संग वन में भ्रमण करूँगी। रसखान

कहते हैं क्योंकि तुझे (कृष्ण) को अच्छा लगता है इस लिये यह सारा तमाशा तेरे लिये करूँगी किन्तु तुम्हारे अधरों पर रखी हुई यह मुरली मैं अपने अधरों पर नहीं रखूँगी।

या लकुटी अरु कामरिया पै, राज्य तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि नवो निधि को सुख, नंद की गाय चराय बिसारौं।।
रसखान कबहुँ इन आँखिन सों ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिन हूँ कलधौत के धाम करील के कुंजन वा पर वारौं।।

(रसखान कहते हैं) इस लकुटी (छड़ी) और कम्बल पर तीनों लोकों का राज्य छोड़ सकता हूँ। आठों सिद्धियों और नवों निधियों का सुख नन्द की गायें चरा कर भुला सकता हूँ। रसखान कहते हैं कि क्या मैं कभी इन आँखों से ब्रज के वन, बाग और तालाबों को देख सकूँगा?

सोने के बने करोड़ों महल वृन्दावन के करील के कुंजों पर न्योछावर कर सकता हूँ।

धूरि भरे अति शोभित श्याम जू, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।
खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनिया कटि पीरी कछौटी।।
वा छवि को रसखान विलोकत, वारत काम कलानिधि कोटी
काग के भाग कहा कहिए हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी।।

(बाल) कृष्ण धूल से भरे अति शोभित हो रहे हैं, सिर पर सुन्दर चोटी है, खेलते, खाते आँगन में घूम रहे हैं, पैरों में पैंजनी और कमर में पीली कछौटी बँधी है। रसखान कहते हैं कि उस छवि पर कामदेव अपनी करोड़ों कलाओं को न्योछावर करते हैं। अहोभाग्य उस कौवे के

जो कृष्ण के हाथ से माखन रोटी छीन कर ले गया।

४। मानुष हौं तो वही रसखान, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पशु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नन्द की धेनु मँझारन।।
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो लियो कर छत्र पुरन्दर कारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं, मिलि कालिन्दि कूल कदम्ब की डारन।।

रसखान कहते हैं कि (अगले जन्म में) मैं यदि मनुष्य हूँ तो मैं गोकुल के ग्वालों और गायों के बीच रहना चाहूँगा। यदि मैं बेबस पशु हूँ तो मै नन्द की गायों के साथ चरना चाहूँगा। अगर मैं पत्थर हूँ तो उसी पहाड़ का जिसे कृष्ण ने इन्द्र के कारण अपनी उँगली पर उठाया

था। यदि मैं पक्षी हूँ तो मैं यमुना के तट पर किसी कदम्ब वृक्ष पर बसेरा करूँ।


५। गावैं गुनी गनिका गन्धर्व औ सारद सेस सबै गुण गावैं।
नाम अनन्त गनन्त गनेस जो ब्रह्मा त्रिलोचन पार न पावैं।।
जोगी जती तपसी अरु सिद्ध निरन्तर जाहिं समाधि लगावैं।
ताहिं अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पे नाच नचावैं।।

जिसके गुण अप्सरायें, गन्धर्व, शारदा और शेष सभी गाते हैं, जिसके अगणित नामों को गणेश भी नहीं गिन सकते, ब्रह्मा और त्रिलोचन शिव जी जिसकी महिमा का पार नहीं पाते हैं, योगी, यती, तपस्वी और सिद्ध जिसको पाने के लिये समाधि लगाते हैं, उसी (कृष्ण) को

अहीरों की कन्यायें कटोरे भर मट्ठे के लिये नाच नचाती हैं।

६। सेस गनेस, महेस, दिनेस, सुरेसहु जाहिं निरन्तर गावैं।
जाहिं अनादि, अनन्त अखंड, अछेद, अभेद सुबेद बतावैं।
नारद से सुक व्यास रटैं पचि हारे तऊ पुनि पार न पावैं।
ताहिं अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पे नाच नचावैं।।

शेष, महेश, गणेश, दिनेश (सूर्य) और सुरेश (इन्द्र) जिसके गुण निरन्तर गाते हैं, जिसे वेद अनादि, अनन्त, अखंड, अछेद्य, और अभेद बतातेहैं, नारद, शुकदेव और व्यास जैसे मुनि जिसका नाम रटते हैं और प्रयत्न करके भी उसका पार नहीं पाते हैं, उसी (कृष्ण) को अहीरों

की कन्यायें कटोरे भर मट्ठे के लिये नाच नचाती हैं।

७। संकर से सुर जाहिं जपैं चतुरानन ध्यानन धर्म बढ़ावैं।
नेक हिये में जो आवत ही जड़ मूढ़ महा रसखान कहावै।।
जा पर देव अदेव भुअंगन वारत प्रानन प्रानन पावैं।
ताहिं अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पे नाच नचावैं।।

शंकर जी जैसे देव जिसे जपते हैं और ब्रह्मा जी धर्म की वृद्धि के लिये जिसका ध्यान करते हैं, जिसके बस तनिक ही हृदय में आ जाने पर मेरा जैसा जड़, मूढ़ रसखान (रस की खान) कहलाता है, जिस पर देवता, राक्षस, नाग अपने प्राणों को न्योछावर करते हैं, उसी (कृष्ण)

को अहीरों की कन्यायें कटोरे भर मट्ठे के लिये नाच नचाती हैं।
 
 
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